बढ़ती महंगाई और आर्थिक दबाव पर सरकार घिरी, जनता से त्याग की अपील पर तेज हुआ विरोध

बढ़ती महंगाई और आर्थिक दबाव पर सरकार घिरी, जनता से त्याग की अपील पर तेज हुआ विरोध


पेट्रोल, गैस और रोजमर्रा के खर्चों को लेकर केंद्र सरकार की नीतियों पर सवाल, मजदूर संगठन ने कहा — आम आदमी पर लगातार बढ़ रहा बोझ
नई दिल्ली, ।
देश में लगातार बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और आम लोगों की आर्थिक परेशानियों के बीच केंद्र सरकार की नीतियों को लेकर राजनीतिक और सामाजिक संगठनों की ओर से सवाल उठाए जा रहे हैं। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा देशवासियों से सोना, तेल और पेट्रोल के उपयोग में कमी लाने की अपील के बाद इस विषय पर बहस और तेज हो गई है। इसी मुद्दे को लेकर स्वामी नाथ जैसवाल ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि सरकार जनता पर आर्थिक बोझ बढ़ा रही है, जबकि बड़े उद्योगपतियों और सत्ता से जुड़े लोगों को राहत दी जा रही है।
उन्होंने कहा कि देश का आम नागरिक पहले से ही महंगाई, बेरोजगारी, बढ़ते टैक्स और कम होती आय की वजह से परेशान है। ऐसे समय में जनता से यह कहना कि पेट्रोल कम इस्तेमाल करो, गैस बचाओ और सोना मत खरीदो, लोगों की परेशानियों को समझने के बजाय उन पर अतिरिक्त बोझ डालने जैसा है।
जनता से बचत की अपील पर उठे सवाल
INTUC Federation के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामीनाथ जायसवाल ने कहा कि सरकार लगातार जनता से त्याग और बचत की बात कर रही है, लेकिन दूसरी तरफ राजनीतिक कार्यक्रमों, प्रचार अभियानों और बड़े आयोजनों में भारी खर्च किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सत्ता पक्ष की रैलियों में लाखों लोगों को बसों और वाहनों से लाया जाता है, करोड़ों रुपये प्रचार पर खर्च किए जाते हैं, लेकिन जब आम आदमी की बात आती है तो उसे सादगी और त्याग का संदेश दिया जाता है।
उन्होंने कहा कि यदि वास्तव में आर्थिक संकट गंभीर है तो सबसे पहले सरकार को अपने खर्चों में कटौती करनी चाहिए। बड़े-बड़े प्रचार अभियानों, विदेशी दौरों और भव्य राजनीतिक कार्यक्रमों पर रोक लगानी चाहिए ताकि जनता को यह संदेश जाए कि सरकार भी आर्थिक अनुशासन का पालन कर रही है।
जायसवाल ने कहा कि देशभक्ति का अर्थ केवल आम आदमी से त्याग मांगना नहीं हो सकता। यदि देश आर्थिक संकट से गुजर रहा है तो उसकी जिम्मेदारी केवल जनता पर नहीं डाली जा सकती। सरकार को भी उदाहरण प्रस्तुत करना होगा।
महंगाई ने मध्यम वर्ग और मजदूरों की मुश्किलें बढ़ाईं
संगठन ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में खाने-पीने की वस्तुओं, रसोई गैस, बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की कीमतों में लगातार वृद्धि हुई है। इसका सबसे ज्यादा असर गरीब और मध्यम वर्ग पर पड़ा है। मजदूर वर्ग जहां दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए संघर्ष कर रहा है, वहीं मध्यम वर्ग घर की किस्तों, बच्चों की पढ़ाई और रोजमर्रा के खर्चों के दबाव में जी रहा है।
स्वामीनाथ जायसवाल ने कहा कि महंगाई जिस तेजी से बढ़ी है, उस अनुपात में मजदूरों और कर्मचारियों की आय नहीं बढ़ी। निजी क्षेत्र में नौकरी की असुरक्षा बढ़ रही है, ठेका प्रथा का विस्तार हो रहा है और छोटे व्यापारियों की स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है।
उन्होंने कहा कि आज देश में करोड़ों परिवार ऐसे हैं जो हर महीने सिर्फ घर का खर्च चलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। गैस सिलेंडर, पेट्रोल और खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतों ने आम लोगों का बजट बिगाड़ दिया है। ऐसे समय में सरकार को राहत देने की आवश्यकता है, न कि लोगों से और बचत करने की अपील करने की।
कॉरपोरेट घरानों को लाभ पहुंचाने का आरोप
INTUC Federation ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियों का सबसे अधिक लाभ बड़े उद्योगपतियों और कॉरपोरेट समूहों को मिला है, जबकि छोटे व्यवसायियों और आम नागरिकों को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है।
जायसवाल ने कहा कि एक तरफ देश की बड़ी-बड़ी संपत्तियां निजी हाथों में जा रही हैं, दूसरी तरफ आम जनता को खर्च कम करने और बचत बढ़ाने की सलाह दी जा रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर त्याग केवल आम आदमी ही क्यों करे, जबकि बड़े उद्योगपति लगातार अपनी आर्थिक ताकत बढ़ाते जा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि सरकार को ऐसी नीतियां बनानी चाहिए जिससे छोटे उद्योग, स्थानीय व्यापार और रोजगार के अवसर मजबूत हों। यदि आर्थिक विकास का लाभ केवल चुनिंदा लोगों तक सीमित रहेगा तो सामाजिक असमानता और बढ़ेगी।
युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी पर चिंता
संगठन ने देश में बढ़ती बेरोजगारी को भी गंभीर समस्या बताया। स्वामीनाथ जायसवाल ने कहा कि लाखों शिक्षित युवा रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं, लेकिन स्थायी नौकरियों के अवसर लगातार कम होते जा रहे हैं। सरकारी भर्तियां धीमी हैं और निजी क्षेत्र में अस्थायी रोजगार बढ़ रहा है।
उन्होंने कहा कि सरकार को युवाओं के लिए बड़े स्तर पर रोजगार अभियान चलाना चाहिए। छोटे और मध्यम उद्योगों को आर्थिक सहायता देकर रोजगार के नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं। मजदूरों और कर्मचारियों का वेतन बढ़ाने से भी बाजार में मांग बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
जायसवाल ने कहा कि केवल भावनात्मक अपील करने से आर्थिक संकट दूर नहीं होगा। इसके लिए ठोस नीतियों और योजनाओं की जरूरत है, जिनका सीधा लाभ आम जनता को मिले।
सरकार से रखी गई प्रमुख मांगें
INTUC Federation ने केंद्र सरकार के सामने कई प्रमुख मांगें रखीं। संगठन ने पेट्रोल, डीज़ल और रसोई गैस की कीमतों में तत्काल राहत देने की मांग की। इसके साथ ही आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए विशेष नीति लागू करने की बात कही गई।
संगठन ने युवाओं के लिए बड़े स्तर पर रोजगार अभियान शुरू करने, मजदूरों और कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि करने तथा छोटे व्यापारियों और मध्यम वर्ग को टैक्स में राहत देने की मांग भी उठाई।
इसके अलावा सरकारी फिजूलखर्ची, महंगे प्रचार अभियानों और अनावश्यक खर्चों पर रोक लगाने की मांग की गई। संगठन ने सार्वजनिक संपत्तियों के निजीकरण पर भी पुनर्विचार करने की अपील की।
स्वामीनाथ जायसवाल ने कहा कि देश की जनता अब केवल भाषण नहीं बल्कि ठोस आर्थिक सुधार चाहती है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार जनता का ध्यान वास्तविक मुद्दों से हटाकर भावनात्मक अपीलों में उलझाने का प्रयास कर रही है।
उन्होंने कहा कि जनता यह जानना चाहती है कि महंगाई कब कम होगी, रोजगार कब मिलेगा और आम आदमी को राहत कब मिलेगी। केवल बचत और त्याग की सलाह देकर सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।
संगठन ने अपने बयान में कहा कि देश की आर्थिक मजबूती का रास्ता जनता पर बोझ बढ़ाने से नहीं बल्कि रोजगार बढ़ाने, महंगाई नियंत्रित करने, मजदूरों को मजबूत बनाने और आर्थिक समानता स्थापित करने से निकलेगा।

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