छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी
*किसानों से “खाद“ छीनने का षड्यंत्र बेनकाब, एग्री स्टैक, फार्मर आईडी और ई-पीओएस की बाध्यता किसानों पर अत्याचार*
*खाद उपलब्ध कराने में अपनी अक्षमता छुपाने के लिए ही यह सरकार नए नए पैंतरे आजमा रही है*
रायपुर/21 अप्रैल 2026। खाद्य वितरण के लिए फार्मर आईडी के अनिवार्यता को किसान विरोधी षड्यंत्र करार देते हुए प्रदेश कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठ प्रवक्ता सुरेंद्र वर्मा ने कहा है कि जिस तरह से छत्तीसगढ़ के 9 लाख से अधिक किसानों को एग्री स्टैक पोर्टल में पंजीयन रोक कर समर्थन मूल्य पर धान बेचने से वंचित किया था इस तरह से अब उन किसानों को खाद से भी वंचित करने का तुगलक की फरमान जारी किया गया है। सरकार के इस निर्णय से न सिर्फ यूरिया डीएपी एनपीके और पोटाश जैसे खाद मिलने में दिक्कत होगी बल्कि विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ और सब्सिडी से भी किसान वंचित कर दिए जाएंगे। छत्तीसगढ़ के विभिन्न सरकारी समिति में कुल 40 लाख 89 हजार 908 किसान पंजीकृत शेयर होल्डर हैं, फार्मर आईडी बनाने के लिए एग्री स्टेक परियोजना में अब तक मात्र 31 लाख 68 हजार 555 किसानों का सत्यापन हुआ है इस प्रकार से लगभग 21 प्रतिशत किसान पंजीयन से वंचित हैं। सरकार छत्तीसगढ़ के इन 9 लाख 21 हजार 353 किसानों को खाद नहीं देना चाहती है।
प्रदेश कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठ प्रवक्ता सुरेंद्र वर्मा ने कहा है कि भाजपा की सरकार 41,500 करोड़ की ’अतिरिक्त खाद सब्सिडी’ का ढिंढोरा पीट रही है, जबकि हकीकत यह है कि “नई व्यवस्था“ के नाम पर ’फार्मर आईडी’ ( Farmer ID) और ई-पीओएस (e-pso) मशीनें थोपकर देश भर में खाद की सरेआम राशनिंग (Rationing) शुरू हो गई है! ठेके, रेगहा और बटाई पर खेती करने वाले किसान कहाँ जाएं? सरकार कह रही है कि खाद “जमीन के रिकॉर्ड“ के हिसाब से मिलेगी। तो आधे से ज़्यादा किसान जो दूसरों की जमीन रेगहा या बटाई पर लेकर खेती करते हैं, उन्हें खाद कैसे मिलेगी? क्या भाजपा सरकार ने उन्हें किसान मानना ही छोड़ दिया है? यह भूमिहीन किसानों के साथ सीधा धोखा है!
प्रदेश कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठ प्रवक्ता सुरेंद्र वर्मा ने कहा है कि भाजपा सरकार की नीतियां भेदभावपूर्ण है “औद्योगिक डायवर्जन और कालाबाजारी रोकने“ के बहाने किसानों की जमीन के हिसाब से खाद का कोटा तय किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश में प्रति हेक्टेयर 7 बोरी यूरिया की लिमिट है, छत्तीसगढ़ मे प्रति एकड़ मात्र 3 बोरी की लिमिट तय है। राशनिंग का असली कारण 87,000 करोड़ की बजट कटौती है। एनपीके के दाम 180 रुपए और पोटास के दाम 300 रुपए भाजपा की सरकार ने हाल ही में 10 फरवरी 2026 से बढ़ाए हैं। खाद उपलब्ध कराने में अपनी अक्षमता छुपाने के लिए ही यह सरकार नए नए पैंतरे आजमा रही है। बजट आंकड़े खुद ही गवाही दे रहे हैं, वित्तीय वर्ष 2022-23 (वास्तविक खर्च)ः खाद सब्सिडी 2 लाख 54 हजार करोड़ के पार थी, वित्तीय वर्ष 2026-27 (वर्तमान बजट)ः सब्सिडी घटाकर मात्र 1 लाख 71 हजार करोड़ पर समेट दी गई। जब सरकार ने खुद 87 हजार करोड़ बजट काट लिया, तो किसानों को खाद कहाँ से मिलेगी? अतीत में जब अंर्तराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल और खाद के दाम आसमान पर थे (यूरिया के दाम में 140 प्रतिशत से ज्यादा का उछाल), तब सरकार का काम किसानों को ढाल देना था। लेकिन सरकार ने राहत देने के बजाय सब्सिडी का बजट ही कम कर दिया। नतीजा यह है कि आज देश की सप्लाई चेन चरमरा गई है और किसान खाद के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं।
प्रदेश कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठ प्रवक्ता सुरेंद्र वर्मा ने कहा है कि सरकार के अनुसार आगामी खरीफ सीजन में 15 लाख 55 हजार मीट्रिक टन खाद की आवश्यकता अनुमानित है, पर इस सरकार की तैयारी आधी भी नहीं है। असल आवश्यकता 21 लाख मीट्रिक टन खाद की है, कम खाद की उपलब्धता पर सहकारी समिति को प्राथमिकता देना चाहिए लेकिन पिछले खरीफ सीजन में सरकार ने सहकारी सोसाइटियों को कम खाद दिया और निजी दुकानदारों को अधिक जिसके चलते जमकर ओवर रेट और कालाबाजारी हुई। भाजपा सरकारें अपनी बजट कटौती का दंड किसानों को मत दीजिए। अन्नदाता को उनके हक की पूरी खाद चाहिए, पाबंदियां नहीं।
सुरेंद्र वर्मावरिष्ठ प्रवक्ताछत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटीमोबाइल नं. 98262-74000

