आज ईद उल अज़हा के मौके पर छत्तीसगढ़ अल्पसंख्यक विभाग चेयरमैन इम्तियाज़ हैदर ने बताया कि आज के दिन कुर्बानी दी जाती है,यह एक जरिया है जिससे बंदा अल्लाह की रजा हासिल करता है। बेशक अल्लाह को कुर्बानी का गोश्त नहीं पहुंचता है, बल्कि वह तो केवल कुर्बानी के पीछे बंदों की नीयत को देखता है। अल्लाह को पसंद है कि बंदा उसकी राह में अपना हलाल तरीके से कमाया हुआ धन खर्च करे।
ईद उल अज़हा का त्यौहार कुर्बानी और इबादत का है। हम भले ही बकरे को कुर्बानी के तौर पर हलाल करते हैं लेकिन असल में यह दिन गरीब, बेसहारा और जरूरतमंदों के लिए कुछ कुर्बान करने का है, आइए कुर्बानी के इस दिन की मुबारकबाद ज्यादा से ज्यादा लोगों तक लुटाएं ताकि हर संपन्न और शौहरतमंद जिंदगियां जरूरतमंदों के लिए कुछ अंश निकालें और सभी एक समान हो जाएं।
कुर्बानी का इतिहास :-
- इब्राहिम अलैहिस्सलाम एक पैगंबर गुजरे थे, जिन्हें ख्वाब में अल्लाह का हुक्म हुआ कि वे अपने प्यारे बेटे इस्माईल (जो बाद में पैगंबर हुए) को अल्लाह की राह में कुर्बान कर दें। यह इब्राहिम अलैहिस्सलाम के लिए एक इम्तिहान था, जिसमें एक तरफ थी अपने बेटे से मुहब्बत और एक तरफ था अल्लाह का हुक्म। इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने सिर्फ और सिर्फ अल्लाह के हुक्म को पूरा किया और अल्लाह को राजी करने की नीयत से अपने लख्ते जिगर इस्माईल अलैय सलाम की कुर्बानी देने को तैयार हो गए।
अल्लाह बड़ा ही रहीमो करीम है और वह तो दिल के हाल जानता है। जैसे ही इब्राहिम अलैहिस्सलाम छुरी लेकर अपने बेटे को कुर्बान करने लगे, वैसे ही फरिश्तों के सरदार जिब्रील अमीन ने बिजली की तेजी से इस्माईल अलैहिस्सलाम को छुरी के नीचे से हटाकर उनकी जगह एक दुम्बा रख दिया। इस तरह इब्राहिम अलैहिस्सलाम के हाथों दुम्बा जिब्हा होने के साथ पहली कुर्बानी हुई। इसके बाद जिब्रील अमीन ने इब्राहिम अलैहिस्सलाम को खुशखबरी सुनाई कि अल्लाह ने आपकी कुर्बानी कुबूल कर ली है और अल्लाह आपकी कुर्बानी से राजी है।
इसी के साथ उन्होंने सभी प्रदेशवासियों को त्याग, समर्पण और भाईचारे के मुबारक़ पर्व ईद उल-अज़हा की ढेरों बधाई देते हुए दुआ की,कि हमारा प्रदेश तरक़्क़ी के और नये मुक़ाम हासिल करे और इस गुलिस्तांने हिंदुस्तान में सभी लोग मोहब्बत भाईचारे से रहे।

