साधारणता में असाधारण की खोज स्वयं प्रकाश के लेखन का मूल मन्त्र – शशांकस्वयं प्रकाश की छठी पुण्यतिथि पर स्मरणांजलि



साधारणता में असाधारण की खोज स्वयं प्रकाश के लेखन का मूल मन्त्र – शशांकस्वयं प्रकाश की छठी पुण्यतिथि पर स्मरणांजलि
जयपुर। स्वयं प्रकाश अपनी कहानियों में कभी कभी पात्र के रूप में भी शामिल हो जाते हैं। वे अपने जीवन के अंशों को लेकर ही अपनी कहानियों में आते हैं जिनमें जीवन का संघर्ष सबसे मुख्य है। उनकी कहानियों का कथ्य पाठकों से पूछता है कि जीवन को बदलने और बनाने के लिए आप क्या कर रहे हैं? अकारण नहीं है कि वे बहुत ही स्पष्ट, मारक और लोगों को सामने खड़ा करने वाला कथ्य चुनते थे। सुप्रसिद्ध साहित्यकार और दूरदर्शन के निदेशक शशांक ने स्वयं प्रकाश की छठी पुण्यतिथि पर अभिव्यक्ति के ऑनलाइन मंच पर कहा कि स्वयं प्रकाश की कहानियां व्यवस्था की गहरी पड़ताल करती हैं। उनके यहाँ व्यंग्य के अपूर्व सिलसिले दिखाई पड़ते हैं और उनका व्यंग्य भाषा को बेधक बनाता है। शशांक ने स्वयं प्रकाश की अनेक महत्त्वपूर्ण कहानियों का उल्लेख करते हुए कहा कि बलि कहानी में आदिवासी लड़की का चित्रण अद्भुत है जहाँ एक छोटी सी लड़की का जीवन संघर्ष भुलाया नहीं जा सकता और जिसमें स्वयं प्रकाश ने जीवन की निर्ममता बताई है। स्वयं प्रकाश की कहानी उस तरफ के संदर्भ में शशांक ने कहा कि इस कहानी में नखतसिंह जैसा साधारण पात्र तमक कर कहता है यदि कोई मर रहा है तो भी क्या हम तमाशा देखते रहेंगे? मीडिया और प्रदर्शनप्रियता की इस प्रवृत्ति पर स्वयं प्रकाश जैसे सजग कथाकार ने बहुत पहले हमको आगाह कर दिया था। उन्होंने नीलकांत का सफर जैसी स्वयं प्रकाश की शुरुआती कहानी का उल्लेख कर बताया कि इस कहानी में अशिक्षित मजदूर ट्रैन में घुसकर कैसे खिड़कियाँ खोलकर रोशनी और हवा भीतर लाते हैं जबकि इससे पहले वे बताते हैं कि ट्रैन में बैठे अन्य लोगों का आचरण कैसा है। यह कहानी देश के रूपक की तरह बन गई है और स्वयं प्रकाश की कहानी कला यहाँ अपने श्रेष्ठ अंदाज़ में आई है। स्वयं प्रकाश की साम्प्रदायिकता विरोधी कहानियों को भी शशांक ने अलग से रेखांकित करते हुए बताया कि उनके यहाँ साधारण की प्रतिष्ठा और जीवन की निरन्तरता सबसे महत्त्वपूर्ण है। क्या तुमने कभी कोई सरदार भिखारी देखा का उल्लेख कर शशांक ने कहा कि कहानी में अत्यंत कठिन परिस्थिति में भी बूढ़े सरदारजी का भीख न मांगना और चाय के पैसे उधार मांगना उनके चरित्र को बड़ा बनाता है। उन्होंने इसे अर्नेस्ट हेमिंग्वे के अमर उपन्यास ओल्ड मैन एन्ड द सी से तुलनीय बताया। वहीँ पार्टीशन के समबन्ध में शशांक की टिप्पणी थी कि पार्टीशन जैसी कहानी में कुर्बान भाई के माध्यम से स्वयं प्रकाश बताते हैं कि प्रगतिशील मुसलमान पर भी कैसे कैसे दबाव पड़ते हैं और लोग उससे दूर हो जाते हैं। स्वयं प्रकाश बताते हैं कि प्रगतिशीलता के बावजूद मनुष्य को सहारा चाहिए। अकेले छोड़ देने से व्यक्ति टूट जाएगा। स्वयं प्रकाश की भाषा की प्रशंसा करते हुए शशांक ने कहा कि सरल और सहज भाषा में कथन की सम्पन्नता और विवेकशीलता स्वयं प्रकाश की पहचान है।  उन्होंने कहा कि स्वयं प्रकाश ऐसे कथाकार हैं जो भाषा में मुहावरे गढ़ना जानते हैं। स्वयं प्रकाश की कथा भाषा जीवित भाषा है जो प्रेमचंद, यशपाल से चलकर आई है। ज्ञानरंजन, दूधनाथ सिंह, रवींद्र कालिया की तरह उन्होंने अपनी भाषा का आविष्कार किया। शशांक ने स्वयं प्रकाश की अन्य प्रसिद्ध कहानियों सूरज कब निकलेगा, नैनसी का धूड़ा, संहारकर्ता का भी विस्तार से उल्लेख करते हुए बताया कि साधारणता में असाधारण की खोज स्वयं प्रकाश के कहानी लेखन का मूल मन्त्र है। वैचारिकता के बड़बोलेपन से दूर रहकर भी विचारधारा की प्रखरता उनकी कहानियों को महत्त्वपूर्ण बनाती है। सहज रूप से राजस्थान का जनजीवन उनकी कहानियों में आता है। प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ाव को याद करते हुए शशांक ने कहा कि एक कार्यकर्ता के रूप में स्वयं प्रकाश ने जगह जगह जाकर भाषण नहीं दिए लेकिन उनकी विश्वसनीयता ने प्रगतिशील लेखक संघ को मजबूत बनाया। वसुधा के सम्पादन के दौरान अनेक महत्त्वपूर्ण और यादगार अंक उन्होंने दिए।  चर्चा में पश्चिम बंगाल से जुड़ीं डॉ यवनिका तिवारी ने कहा कि कहानीकारों के मूल सरोकारों से परिचित होने के लिए उनके कथेतर गद्य की ओर भी कई बार जाना पड़ता है। स्वयं प्रकाश की कृति एक कहानीकार की नोटबुक भी उस अर्थ में महत्वपूर्ण साबित होती है। जयपुर से जुड़े डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने कहा कि स्वयं प्रकाश ने अपनी बहुत सारी कहानियों में अत्यंत साधारण, बल्कि कहें अकिंचन जन की असाधारणता को चित्रित किया है। उन्होंने कहा कि क्या तुमने कभी कोई सरदार भिखारी देखा कहानी स्वयं प्रकाश के वास्तविक अनुभव पर आधारित है। डॉ अग्रवाल ने स्वयं प्रकाश की भाषा को अत्यंत सहज और आत्मीय बताया जैसे वे अपने पाठक से बतिया रहे हों। नीता श्रीवास्तव ने कहा कि स्वयं प्रकाश के लेखन का  अधिकांश विषय सर्वहारा वर्ग और जनसामान्य की मनोव्यथा पर है। दिल्ली से जुड़े डॉ पल्लव ने कहा कि भूमंडलीकरण की परिघटना पर हिंदी में पहला उपन्यास स्वयं प्रकाश ने लिखा जो ईंधन शीर्षक से प्रकाशित हुआ। अजमेर से जुड़ीं डॉ विमलेश शर्मा ने कहा स्वयं प्रकाश की कहानियों का स्वर जनवादी है । वे आम आदमी, मजदूर, किसान, और निम्न-मध्य वर्ग के संघर्षों को अपनी कहानियों का केंद्र बनाते हैं, उनकी समस्याओं- संवेदनाओं को उजागर करते हैं। उनकी कहानियों के चरित्र बेहद सहज है। संवाद में डॉ सदाशिव श्रोत्रिय, डॉ एकता मंडल, डॉ साहिल कैरों  सहित अनेक लेखक, शिक्षक और पाठक जुड़े। संयोजन कर रहे राजस्थान विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग में सहायक आचार्य डॉ विशाल विक्रम सिंह ने अंत में आभार प्रदर्शित किया। 
अभिनन्दन शोधार्थी, हिंदी विभाग दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली  8447867166

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *