तेरापंथ धर्म संघ के प्रखर ज्ञानेश्वर थे जयाचार्य – साध्वी मंजुयशा

तेरापंथ धर्म संघ के प्रखर ज्ञानेश्वर थे जयाचार्य – साध्वी मंजुयशा

कांकरोली। तेरापंथ प्रज्ञा विहार भवन में युग प्रधान आचार्य श्रीमहाश्रमण की सुशिष्या साध्वी मंजुयशा के पावन सान्निध्य में तेरापंथ के चतुर्थ आचार्य श्रीमदजयाचार्य का 148 वां निर्वाण दिवस बड़े उत्साह के साथ मनाया गया।

कार्यक्रम का प्रारंभ साध्वी श्रीजी ने नमस्कार महामंत्र के मंगल उच्चारन से किया गया। साध्वी श्रीजी ने पार्श्वनाथ की सामूहिक मंगल स्तुति की। साध्वी श्रीजी ने अपने मंगल उद्बोधन में कहा- तेरापंथ धर्म संघ एक अनुशासन मर्यादित धर्म संघ है एक आचार एक विचार एवं एक आचार्य इसके मुख्य आधार है। तेरापंथ की यशस्वी आचार्य परम्परा रही है। एक एक आचार्य ने अपनी प्रखर साधना, तपस्या एवं श्रम की बूंदों से इस तेरापंथ उपवन को सींचा है। यशस्वी आचार्य परम्परा में चतुर्थ आचार्य प्रज्ञा पुरुष जयाचार्य का इतिहास गौरवमय इतिहास है। वे आचार्य भिक्षु के कुशल आष्यकार बने। उनका जन्म वि.सं. 1860 मे रोयट ग्राम में हुआ। 7 वर्ष की अल्पायु में वैरागी बने, 10 वर्ष की उम्र में श्रीमदरायचंद जी स्वामी के हाथों दीक्षित हुए। वे बड़े भाग्यशाली पुरुष थे। उन्हे आचार्य भारमलजी स्वामी जैसे समर्थ गुरु मिले, ऋषिराय जैसे दीक्षा गुरु मिले एवं आगम ज्ञान के धुरन्धर विद्वान मुनिहेमराज स्वामी जैसे शिक्षा गुरु मिले। जयाचार्य प्रारंभ से ही प्रतिभावान मुनि थे। वे ज्योतिषी ज्ञान, स्वप्न दर्शन, ध्यान के गहन ज्ञाता थे। उन्होंने आगे कहा- वे एक कुशल रचनाकार थे। छोटी अवस्था में ही उन्होनें पन्नवणा की जोड़ लिखी। उन्होंने अपने जीवनकाल में साढ़े तीन लाख पद्य प्रमाण साहित्य की रचना की। भगवती जैसे आगम का राजस्थानी भाषा में पद्यानुवाद किया आज राजस्थानी साहित्य में सबसे बड़ा ग्रंथ माना जाता है। वे स्थितप्रज्ञ योगीराज थे। तेरापंथ के आद्यप्रवर्तक आचार्य भिक्षु ने तप त्याग नियम के फूल विखेरे थे जयाचार्य ने उसे माला का रूप दिया। संघ में व्यवस्था को सुंदर बनाने के लिए आहार का संविभाग, श्रम का संविभाग, जल संविभाग स्थान प्रतिलेखना, आदि की व्यवस्था कर संगठन को मजबूत किया। इस संघ में उनकी अनुपम देन है। 30 वर्ष तक उन्होंने संघ का कुशल “एवं सफल नेतृत्व किया। वे अनुशासन प्रिय थे। अनुशासन का उलंघन करने पर किसी भी साधु साध्वियों को व्यक्शीश नहीं करते। संघ सेवा करने वालों को तथा विशिष्ठ कार्य करने वालों का उत्साह भी बढाते। वे स्वाध्याय प्रेमी थे। हजारों गाथाओं की स्वाध्याय करते थे। इस प्रकार वे संघ में तेजस्वी सूर्य बनकर आए। अपने तेजस्वी व्यक्तित्व के द्वारा जन जन को प्रभावित किया। ऐसे प्रवर साधनामय जीवन जीने वाले आचार्य जीतमलजी ने 30 वर्ष तक संघ की अनुशासना कर वि. सं. 2038 में भादव कृष्णा 12 को जयपुर में महाप्रयाण किया। ऐसे अनुशास्ता को पाकर धर्मसंघ धन्य धन्य हो गया । इस अवसर पर साध्वी चिन्मयप्रभा ने भी अपनी भावाभि – व्यक्ति दी। साध्वियों ने एक सामूहिक सुमधुर गीत प्रस्तुत कर परिषद को भावविभोर कर दिया। तेरापंथ सभा के मंत्री विनोद चौरडिया ने पर्युषण काल में होने वाली व्यवस्था के बारे में तथा अष्टदिवसीय उपासक श्रेणी की साधना करने वालों के लिए विस्तार से जानकारी दी। मंगलपाठ से कार्यक्रम सानन्द संपन्न हुआ।

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