सबसे अच्छी लगती थी स्कूल में पीपल के पेड़ पर टंगी बडी घंटी राजीव गुप्ता राजीव गुप्ता होली क्रास बैरन बाजार स्कूल के पूर्व छात्र
मे री स्कूली शिक्षा वर्ष 1975 में शुरू हुई। उस समय निजी अंग्रेजी मीडियम स्कूलों का रिवाज शुरू ही हुआ था। शहर में चुनिन्दा बड़े अंग्रेजी मीडियम स्कूल थे। उस समय अंग्रेजी और हिंदी का इतना बड़ा विभाजन नहीं था, जितना इस समय है। होली क्रास बैरन बाजार उन गिने चुने स्कूलों में था, जिसका नाम अच्छे स्कूलों में शुमार था। हिंदी मीडियम स्कूल उस समय कालीबाड़ी, सेंट पाल भी थे जहां से पढ़े बधो उधा शिक्षा प्राप्त कर नाम कमा रहे थे।
उस समय बसें नहीं होती थी। हम रिक्शे से स्कूल आना जाना करते थे, आठ लोग एक रिक्शे में रिक्शे वाला आशाराम का मेन रोड पर मकान था। एमनुएल भैया, स्कूल के चपरासी, इनके जिम्मे समय पर घंटी बजाने का काम था। बड़ी घंटी जो पीपल के पेड़ से टंगी रहती, शाम चार बजे की सबसे अच्छी लगती थी और हर चालीस मिनट पर बजती थी। मेरा खाने का टिफन,
होली क्रास स्कूल और मेरी यादें राजीव गुप्ता
जो आमतौर पर खाने की छुट्टी से पहले ही खत्म हो जाता था। कभी कभी तो चलती क्लास में ही। टीचर को लेकर मेरी जो प्रारंभिक यादें हैं, वे क्लास वन से पहले के दो साल हैं। उन कक्षाओं में हमारी टीचर एमिला डेनेट थी जिन्हें हम सब बेबी टीचर भी कहते येत थे। इतना स्नेह और अपनापन था इनमें कि आज भी कभी मुलाकात में आशीर्वाद पाने के लिए सर झुक जाता है।.
प्राथमिक शिक्षा में उनके बाद डे टीचर हमारी मे क्लास टीचर रहीं, जो बेहद सख्त थी। उनके ही मार्गदर्शन में असली मायने में मेरी हिंदी पढ़ने पढ़ाने की रुचि जागी। होली क्रास बैरन बाजार स्कूल अनुशासन प के मामले में बहुत अच्छा स्कूल माना जाता था। पैरेंट टीचर मीटिंग तब अपने शुरुआती दौर में थी और ऐसी व्यवस्था बहुत से स्कूलों में नहीं थी। मेरी पैरंट टीचर मीटिंग में मेरी भाभी जाया करती थी।

