कांग्रेस प्रदेश सचिव राजेन्द्र बंजारे ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी डॉक्टर खूबचंद बघेल मानव समाज मे फैले छुवाछुत को मिटाने की भूमिका में अग्रिम पंक्ति पर खड़े रहे।
छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव एवम पूर्व जनपद अध्यक्ष राजेन्द्र पप्पू बंजारे ने स्वतंत्रता सग्राम सेनानी डॉक्टर खूबचंद जी की जयंती पर खूबचंद की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर नमन करते हुए कहा कि भारत की आजादी के आंदोलन में सक्रिय योगदान देकर एवं तत्कालीन भारत में चल रहे राजनैतिक-सामाजिक परिवर्तन तथा आर्थिक मुक्ति आंदोलन में हिस्सा लेकर जिन्होंने इतिहास रचा है, उनमें एक सशक्त हस्ताक्षर डॉ. खूबचंद बघेल जी का भी है। छत्तीसगढ़-राज्य जो अस्तित्व में नवम्बर 2000 से आया है, उसके प्रथम स्वप्न दृष्टा, डॉ. खूबचंद बघेल जी ही थे। आज भले ही उन्हें इसकी मान्यता देने में उच्चवर्ण एवं वर्ग के लोगों को हिचकिचाहट होती है, लेकिन यही ऐतिहासिक सत्य/तथ्य है। जाति व्यवस्था को विछिन्न कर समस्त मानव जाति को एक जाति के रूप में देखने की चाहत रखने वाले डॉ. बघेल के व्यक्तित्व में छत्तीसगढ़ की खुशबू रची-बसी थी। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिये त्याग और बलिदान करने वालों में डॉ. साहब का नाम अग्रिम पंक्ति पर है।
छत्तीसगढ़ के संस्कृति कला एवं रीति रिवाजों की महक, उनमें रची बसी थी, जो उनके द्वारा लिखित “जनरैल सिंग” नामक नाटक के इस कविता में झलकती है-
पूर्व जनपद अध्यक्ष राजेंद्र बंजारे ने डॉक्टर खूबचंद बघेल जी के सामाजिक कार्य को बताया कि
ऊँच-नीच, छूआछूत के चलते छत्तीसगढ़ के गाँवों में नाई, सतनामी समाज के भाईयों का बाल नहीं काटते थे। उनके मुहल्ले की सफाई भी नहीं होती थी। ग्राम-चन्दखुरी, मंदिरहसौद, ब्लाक – आरंग, जिला-रायपुर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, जो आगे चलकर विधायक भी चुने गये, जिन्हें दुकान का धंधा करने के कारण लोग सेठ कहकर पुकारते थे – ‘स्व. अनंत राम बर्छिहा‘ ने सतनामी समाज के लोगों का बाल काटने, दाढ़ी बनाने (साँवर बनाने) एवं उनके मुहल्ले की सफाई करने का काम किया। इससे उनका अपना कूर्मि समाज नाराज हो गया, उन्हें कूर्मि जाति से बहिष्कृत कर दिया । डॉ. साहब ने इस कार्य के महत्व बताने एवं नाराज समाज को अपने गलती का एहसास करवाने के लिये “ऊँच-नीच” नामक नाटक लिखकर उसका सफल मंचन करवाया । इस नाटक का असर यह हुआ, बर्छिहा जी का सामाजिक बहिष्कार रद्द हुआ एवं उनके कार्य की सर्वत्र प्रशंसा हुई।
कांग्रेस प्रदेश सचिव राजेन्द्र बंजारे ने डॉक्टर साहब खूबचंद बघेल जी के राजनैतिक कार्य को बतस्य की डॉ. साहब सन् 1931 तक शासकीय अस्पताल में डॉक्टर रहे, शासकीय सेवा से त्यागपत्र दे पूरी तरह से स्वाधीनता आंदोलन में कूद गये। 1931 में “जंगल सत्याग्रह” में पुनः जेल गये, काँग्रेस के पूर्णकालिक सदस्य बन, स्वतंत्रता संग्राम के लिये, महात्मा गाँधी द्वारा चलाये जाने वाले आंदोलन में शामिल हुये। 1932 में रायपुर जिला काँग्रेस कमेटी के डिस्ट्रिक्ट कौंसिल रायपुर में फिजिकल इन्सट्रक्टर के पद पर नियुक्ति किये गये। “भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस” द्वारा चलाये जा रहे स्वाधीनता संग्राम में समय-समय पर आयोजित विभिन्न आंदोनल में सक्रियता से भाग लिया। 1932 में “द्वितीय सविनय अवज्ञा आंदोलन” में शामिल हुये। सन् 1935 के अधिनियम ‘The Govt. of India Act’ के आधार पर भारत में संघात्मक प्रणाली स्थापित की गई, जिसके फलस्वरूप 1937 में निर्वाचन हुये काँग्रेस को अभुतपूर्ण सफलता मिली। डॉ. साहब ने काँग्रेस कार्यकर्ता के रूप में सक्रियता से इन चुनावें में हिस्सा लिया। ग्यारह प्रांतों में से 8 प्रांतों में काँग्रेस को बहुमत मिला, जिसमें “सी.पी.एवं बरार” भी शामिल था। द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश सरकार को सहयोग कर, पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्ति का प्रस्ताव काँग्रेस द्वारा 1940 में पास किया गया परंतु ब्रिटिश सरकार ने युद्ध के बाद 1942 में भारत को आजाद करने से इंकार कर दिया। जिसके फलस्वरूप गाँधी जी ने 1941 में सत्याग्रह आंदोलन शुरू किया। “करो या मरो आंदोलन” ‘Do or Die’ में सक्रियता से भाग लिया और जेल गये। 8 अगस्त 1942 में शुरू “भारत छोड़ो आंदोलन” में अपने साथियों सहित 21 अगस्त 1942 को जेल गये एवं ढाई वर्षों तक जेल में रहे।
सन् 1952 का आम चुनाव हुआ, डॉ. खूबचंद बघेल “किसान मजदूर प्रजा पार्टी” से पुनः धरसींवा विधानसभा क्षेत्र के विधायक चुने गये,
पूर्व जनपद अध्यक्ष राजेंद्र बंजारे ने डॉक्टर खूबचंद बघेल जी के सांस्कृतिक एवं साहित्यिक कार्य को बताया कि छत्तीसगढ़ी साहित्य के क्षेत्र में उनका विशेष योगदान रहा है। डॉ. बघेल मौलिक चिंतक थे। नित्य सुबह चार बजे उठकर ध्यान और चिंतन में मग्न हो जाते थे। उनकी लेखनी काफी सशक्त थी। डॉ. बघेल को हर वक्त छत्तीसगढ़ियों की पिछड़ी मानसिकता, दब्बुपन, आर्थिक गुलामी की पीड़ा सताती थी। आखिर मेरे छत्तीसगढ़ में क्या कमी है? यह हमेशा वो चिंतन करते रहते थे। छत्तीसगढ़ी में उन्होंने तीन नाटक लिखे पहला ‘ऊंच-नीच’ समाज में व्याप्त छुआ-छूत और जातिवाद पर करार प्रहार करते हुये। दूसरा ‘करम-छँड़हा’ छत्तीसगढ़ के आम आदमी की गाथा उसकी बेबसी का वर्णन एवं तीसरा ”जनरैल सिंग” जो छत्तीसगढ़ के दब्बुपन को दूर करने का रास्ता सुझाया। इन नाटकों को मंचित करने का छत्तीसगढ़ में, बल्कि सम्पूर्ण भारत में फैली। इस साँस्कृतिक संस्था का शुभारंभ एवं समापन डॉ. बघेल के जन्म स्थली ग्राम-पथरी से हुआ।
संसद के शीतकालीन सत्र में भाग लेने वे दिल्ली गये हुये थे। इसी दौरान 22 फरवरी सन् 1969 को हृदयकालीन रुक जाने से उनका दिल्ली में निधन हुआ। उनकी अंत्येष्टी रायपुर के महादेव घाट में की गई। ऐसे महान व्यक्तित्व को उनके ही प्रेरणा वाक्य से श्रद्धाँजली अर्पित करते हैं-

