अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के नवीनतम फैसले ने अचानक से देश के सियासी पारे को उपर चढ़ा दिया है. हर तरफ इस फैसले को संविधान की मूल आत्मा के विरुद्ध और देश में सामाजिक न्याय को लागू करने के प्रयासों को झटका देने वाला बताते हुए इसकी कड़ी निंदा की जा रही है.
क्या है पूरा मामला
सर्वोच्च न्यायालय ने आरक्षण पर नवीनतम निर्णय जिस मामले में सुनाया है वह दरअसल उत्तराखंड सरकार द्वारा सरकारी सेवाओं में सभी पद अनुसूचित जाति एवं जनजाति को आरक्षण दिए बगैर भरने के 2012 के फैसले से संबंधित है. इस मामले को उत्तराखंड उच्च न्यायालय में ले जाने पर न्यायालय ने सरकार के फैसले को गलत ठहराते हुए सरकार की अधिसूचना को खारिज कर उसे सरकारी नौकरियों में वर्गवार आरक्षण का प्रावधान करने का आदेश दिया था. उत्तराखंड सरकार इसी आदेश के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय पहुंची थी, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने यह फैसला सुनाया है कि राज्य सरकार आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं है.
क्यों हो रहा है फैसले का विरोध
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आरक्षण को लेकर दिया गया नवीनतम फैसला विवादों में घिर गया है. फैसले का विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय के सामने अनुच्छेद 16 की व्याख्या का प्रश्न ही नहीं था जिस पर उसने फैसला सुनाया है. न्यायालय को तो यह देखना था कि पूर्व निर्धारित नियमों का उल्लंघन करते हुए उत्तराखंड सरकार ने आरक्षण क्यों नहीं दिया है. लोगों का यह भी कहना है कि न्यायालय अनुच्छेद 16 की सतही व्याख्या करते हुए संविधान की मूल आत्मा की अनदेखी कर रहा है. यह हैरानी की बात है कि अनुच्छेद 16 में ही उपबंध (6) जोड़कर सवर्णों को दिए गए 10% आरक्षण से न्यायालय को कोई शिकायत नहीं है लेकिन दलितों, आदिवासियों और पिछड़ा वर्ग को दिए गए आरक्षण की वह रक्षा नहीं करना चाहता है. जानकारों का यह भी मानना है कि पूर्व में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ समेत अनेक बड़ी खंडपीठों ने आरक्षण से जुड़े मामलों में आरक्षण देने के पक्ष में फैसला सुनाया है, उस फैसले को सिर्फ 2 सदस्यीय पीठ कैसे बदल सकती है? ऐसे मामलों की सुनवाई संविधान पीठ में होनी चाहिए जिसमें कम से कम 5 न्यायाधीश होते हैं.
क्या होगा फैसले का असर
यह फैसला एक तरह से देश में आरक्षण की समाप्ति की शुरुआत है. इस फैसले के बाद अब नौकरियों में एससी, एसटी, ओबीसी को मिलने वाला आरक्षण पूरी तरह केंद्र व राज्य सरकारों के विवेक पर छोड़ दिया गया है. ऐसे में अगर आज के बाद कोई सरकार इन वंचित वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान किए बिना नौकरियों के विज्ञापन जारी करती है तो उसे चुनौती नहीं दी जा सकती. अनेक राज्यों विशेषकर भाजपा शासित राज्यों में पहले से ही आरक्षण के बावजूद आरक्षित कोटे की सीटें नहीं भरी जा रही थी, ऐसे में अब ये सरकारें शुरुआती स्तर पर ही आरक्षण दिए बगैर विज्ञापन निकालेंगी और सरकारी नौकरियों में आरक्षण को पूरी तरह खत्म कर देंगी.
तो फिर उपाय क्या है
सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा पिछड़े वर्ग के लोगों के मन में न्यायपालिका के प्रति भरोसा, जो पहले से ही सवर्णों के लिए 10% आरक्षण, पदोन्नति में आरक्षण आदि विभिन्न मामलों में अदालती निर्णयों के कारण कम हो चुका है और भी कम होगा. लेकिन असली सवाल यह है कि आगे का रास्ता क्या होगा? इसका जवाब जानने के लिए हमने वरिष्ठ समाज विज्ञानी डॉ. अमरनाथ पासवान से बात की. डॉ. पासवान के अनुसार, “एक तरफ जहां भाजपा सरकार कभी थर्टीन प्वाइंट रोस्टर, कभी बिना आरक्षण के बहाली, तो कभी सरकारी निगमों/ कंपनियों/ उपक्रमों के निजीकरण के जरिए अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़े वर्गों के लिए नौकरियों के अवसर को निरंतर समाप्त करती जा रही है और मोहन भागवत जैसे लोग खुलेआम आरक्षण समाप्त करने की वकालत कर रहे हैं, वहीं अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के नेताओं ने जैसे इन सभी मामलों पर मुँह सिल रखा है. वंचित वर्ग के लोगों और उनके नेताओं को अब यह बात समझ लेनी चाहिए कि उनकी लड़ाई कोई और नहीं लड़ने वाला. उन्हें हर हाल में राज्यों व केंद्र में ऐसी सरकार बनानी होगी जिसकी निष्ठा, नेतृत्व और नीतियां इन वर्गों के विकास और सशक्तिकरण के प्रति समर्पित हो. साथ ही वंचित वर्गों के जो जनप्रतिनिधि भाजपा में हैं या उसके सहयोगी हैं उन्हें भी अब सोचना होगा कि आखिर उनकी निष्ठा किसके साथ होनी चाहिए. डॉक्टर अंबेडकर ने बरसों पहले कहा था कि राजनीतिक सत्ता सर्व कुंजी (मास्टर की) है, जिससे आप प्रगति के समस्त दरवाजों को खोल सकते हैं. उनका यह कथन आज भी पूर्ण सत्य है. एससी, एसटी, ओबीसी को अगर अपना आरक्षण बचाना है और विकास के दरवाजों को खोलना है तो उन्हें राजनीतिक सत्ता की मास्टर की अपने हाथ में रखनी ही होगी.
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