अर्श से फर्श…यूं धूमिल हुआ रघुबर का सितारा

रांची
झारखंड के पहले गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री खुद को गर्व से मजदूर का बेटा कहते थे। सोमवार को आए विधानसभा चुनाव के नतीजों में उन्हें सबसे बड़ी हार का सामना करना पड़ा जबकि साल 2000 में राज्य बनने के बाद वह पहली स्थिर सरकार चला रहे थे। जमशेदपुर के टाटा स्टील प्लांट में मजदूरी करने से लेकर सीएम बनने तक का दास का सफर काफी तेज भरा रहा।

कॉलेज के दिनों से थे नेता
कॉलेज के दिनों से ही रघुबर राजनीति में सक्रिय रहे। उन्होंने जेपी के आंदोलन में हिस्सा लिया और इमर्जेंसी के दौरान जेल भी गए। बाद में उन्होंने 1977 में जनता पार्टी जॉइन कर ली और 1980 में भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक सदस्यों के तौर पर शामिल हुए। जमशेदपुर में मंडल-स्तर के कार्यकर्ता से उठकर वह 2004 में राज्य बीजेपी अध्यक्ष बने। सबसे पहले वह 1995 में जमशेदपुर ईस्ट से विधायक बने और बाद में यहीं से 4 बार और विधानसभा पहुंचे।

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‘राम ने सरयू में ली थी समाधि’
इस बार चुनावों से पहले बीजेपी की सहयोगी AJSU (ऑल झारखंड स्टूडेंट यूनियन) के सीट बंटवारे पर असहमत होकर अकेले चुनाव लड़ने के फैसले से पार्टी को झटका लगा। हालांकि, इसके बावजूद दास अपने मुताबिक उम्मीदवार चुनते गए। यहां तक कि उन्होंने कैबिनेट सदस्य सरयू राय समेत दूसरे कई विधायकों को टिकट नहीं दिए। इससे उनके खिलाफ बगावत होने लगी। एक बीजेपी कार्यकर्ता ने कहा है, ‘बीजेपी नेता हर रैली में राम मंदिर की बात कर रहे थे, शायद वह रामायण भूल गए। रघुबर (राम का एक और नाम) ने सरयू नदी में समाधि ली थी। यही इस बार हुआ।’

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भुगतना पड़ा खामियाजा
दास को आदिवासियों से जुड़े किरायेदारी कानून में संशोधन लाने में असफलता का सामना करना पड़ा। इस कानून से आदिवासियों को उनकी जमीन पर विशेष अधिकार मिले थे। इसके अलावा झारखंड धर्म की आजादी ऐक्ट, 2017 लाकर आदिवासियों का धर्म परिवर्तन रोकने, सरकारी स्कूलों को विलय जैसे फैसलों को खामियाजा भी भुगतना पड़ा। इनके अलावा जमशेदपुर और सरायकेला-खरसावां में उत्पादन की छोटी इकाइयों को बंद करने से नौकरियां चली गईं, प्याज के बढ़ते दाम और भूख और मॉब लिन्चिंग के कारण गईं जानों ने भी दास की लोकप्रियता को ऊंचाई से उतार दिया।

Source: National

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