उद्धव की 'सेना' बनाएगी इतिहास या गुमनामी?

मुंबई
महाराष्‍ट्र में जारी राजनीतिक गतिरोध के बीच शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे की आज पुण्‍यतिथि है। इस दिन शिवसेना आमतौर पर बेहद उदास मन से उन्‍हें याद करती है। हालांकि इस साल बाल ठाकरे की पुण्‍यतिथि एक बड़ा आयोजन होने जा रही है और इसमें एनसीपी भी शामिल होगी। बाल ठाकरे के बेटे उद्धव ने राजनीतिक पंडितों को चौंकाते हुए राज्‍य की राजनीति में वापसी की है। के इस कदम से सियासी गलियारों में अपनी प्रासंगिकता खो रही शिवसेना अब अचानक राज्‍य में शीर्ष पद हासिल करने की ओर तेजी से बढ़ रही है।

महाराष्‍ट्र की राजनीति में बीजेपी के उभार के बाद शिवेसना को ‘दंत विहीन टाइगर’ कहा जाने लगा था। अब राज्‍य में पिछले कुछ दिनों से जारी राजनीतिक घटनाक्रम ने यह दिखा दिया है कि ‘टाइगर’ के दांत फिर से बड़े हो गए हैं और वह हरेक उस व्‍यक्ति को काटने के लिए तैयार हो गया है जो राज्य में उसकी जगह छीनना चाहता है। इसके लिए शिवसेना अपनी विचारधारा को भी किनारे रखने के लिए तैयार हो गई है।

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बाल ठाकरे की तरह जुझारू हैं उद्धव ठाकरे
59 वर्षीय उद्धव ठाकरे के अंदर अपने पिता की तरह से भले ही करिश्‍माई व्‍यक्तित्‍व और भाषण क्षमता न हो लेकिन उनके अंदर वही जूझने की क्षमता है जो बाल ठाकरे के अंदर होती थी। उद्धव ठाकरे ने समय के हिसाब से अपनी पार्टी के अंदर बदलाव किया है और अपने बेटे आदित्‍य ठाकरे की राजनीतिक जमीन को बहुत अच्‍छे से तैयार किया है। उद्धव के राजनीतिक उत्‍तराधिकारी आदित्‍य ठाकरे अपने परिवार से पहले ऐसे शख्‍स हैं जिसने चुनाव लड़ा और अब वर्ली सीट से विधायक हैं।

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आदित्‍य ने स्‍पष्‍ट कर दिया है कि शिवसेना अब हिंसात्‍मक गतिविधियों में शामिल नहीं होगी। चुनाव में किसी पार्टी को स्‍पष्‍ट बहुमत नहीं मिलने और बीजेपी के सीएम पद देने को तैयार नहीं होने की वजह से ही शिवसेना के इस बदले रुख ने कांग्रेस और एनसीपी के साथ उसके गठबंधन को संभव किया। राजनीतिक विश्‍लेषकों के अनुसार उद्धव ने इस ‘दोस्‍ती’ को अंजाम देकर अपना पूरा राजनीतिक करियर दांव पर लगा दिया है।

विश्‍लेषकों के मुताबिक यदि उद्धव का यह दांव काम कर गया तो उसका राष्‍ट्रीय राजनीति पर प्रभाव पड़ सकता है। इससे भारत एक बार फिर से गठबंधन की राजनीति की ओर बढ़ सकता है और यदि यह कदम फेल होता है तो शिवसेना का अस्तित्‍व खतरे में पड़ जाएगा। शिवसेना 2.0 का पहला रूप वर्ष 2015 में देखने को मिला था जब उद्धव ने सामना में छपे उस संपादकीय को चुनौती दी जिसमें कहा गया था कि मुस्लिमों का वोटिंग अधिकार खत्‍म किया जाए।

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उद्धव ने मुस्लिमों का किया समर्थन
उद्धव ठाकरे ने न केवल इस संपादकीय को चुनौती दी बल्कि मुस्लिमों का समर्थन भी किया। यह बाला साहेब ठाकरे की विचारधारा के ठीक उलट था। कट्टर हिंदुत्‍व से अब नरम रुख अपना रही शिवसेना के लिए यह आसान नहीं था। शिवसेना के एक वरिष्‍ठ नेता ने कहा, ‘यह सही है कि शिवसेना बदल रही है लेकिन यह बदलाव अच्‍छे के लिए हो रहा है। हालांकि इस बदलाव का यह मतलब नहीं है कि अपने मूल्‍यों को त्‍याग दिया है। यह स्‍पष्‍ट है कि आगे का रास्‍ता बिना बीजेपी के होगा और हमें बड़ी लड़ाई लड़ना होगा। हमें एक स्‍पष्‍ट और आक्रामक लाइन लेनी होगी।’

राजनीतिक विश्‍लेषक माया सुधाकर ने कहा, ‘वाजपेयी के समय में बाल ठाकरे का हिंदुत्‍व आक्रामक माना जाता था लेकिन मोदी और शाह की जोड़ी के सामने शिवसेना का हिंदुत्‍व बेदम नजर आता है। शिवसेना हिंदुत्‍व के मुद्दे पर बीजेपी का मुकाबला नहीं कर सकती है, इसलिए वे अन्‍य विकल्‍पों पर विचार कर रहे हैं।’ माना जा रहा है कि इसी वजह से उद्धव ठाकरे अपनी धुर विरोधी कांग्रेस-एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बनाने जा रहे हैं।

Source: National

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