सुनील नामदेव, नीलेश शर्मा और साजिद हाशमी बरी; इससे पहले NDPS केस में भी सुनील नामदेव को मिल चुकी है बड़ी न्यायिक राहत

*सुनील नामदेव, नीलेश शर्मा और साजिद हाशमी बरी; इससे पहले NDPS केस में भी सुनील* *नामदेव को मिल चुकी है बड़ी न्यायिक राहत

ढाई साल चली कानूनी लड़ाई का फैसला; पूर्ववर्ती कांग्रेस शासनकाल में पत्रकारों पर हुई कार्रवाई को लेकर फिर उठे गंभीर सवाल*रायपुर/बिलासपुर।* सत्ता से सवाल पूछना और भ्रष्टाचार से जुड़े मुद्दों को सामने लाना अगर पत्रकारिता का अपराध बना दिया जाए, तो अदालत ही वह जगह है जहां सच और आरोपों की असली परीक्षा होती है। वरिष्ठ पत्रकार सुनील नामदेव, नीलेश शर्मा और साजिद हाशमी की लंबी कानूनी लड़ाई में अब अदालत से बड़ी राहत मिली है। बिलासपुर की अदालत ने तीनों पत्रकारों को मामले में बरी कर दिया है।यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वरिष्ठ पत्रकार सुनील नामदेव इससे पहले भी एक गंभीर NDPS प्रकरण का सामना कर चुके हैं, जिसमें उन पर ड्रग्स से जुड़े आरोप लगाए गए थे। रायपुर की विशेष NDPS अदालत ने उस मामले में भी उन्हें बरी कर दिया था।*पहले NDPS केस में भी अदालत से मिली थी राहत*सुनील नामदेव के खिलाफ दर्ज NDPS मामले में अभियोजन की कहानी पर विशेष अदालत में सुनवाई हुई। अदालत ने मामले में आवश्यक कानूनी प्रक्रियाओं के पालन को लेकर गंभीर सवाल दर्ज किए।आपके अनुसार, अदालत ने विशेष रूप से NDPS एक्ट की धारा 50 और 52 से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया के पालन में गंभीर अनियमितताएं पाईं और अभियोजन के मामले को अविश्वसनीय मानते हुए सुनील नामदेव को बाइज्जत बरी कर दिया।अर्थात NDPS प्रकरण में भी सुनील नामदेव को पहले ही न्यायालय से दोषमुक्ति मिल चुकी है। इससे पहले बिलासपुर हाईकोर्ट ने उन्हें इसी मामले में नियमित जमानत भी प्रदान की थी।यही पृष्ठभूमि अब बिलासपुर के ताजा फैसले को और महत्वपूर्ण बनाती है।*फिर कटघरे में पत्रकार, फिर अदालत में राहत*वर्ष 2023 में भ्रष्टाचार से जुड़ी खबरों के प्रकाशन-प्रसारण को लेकर सुनील नामदेव, नीलेश शर्मा और साजिद हाशमी के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। मामला आगे बढ़ा और तीनों पत्रकारों को करीब ढाई वर्ष तक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी।बचाव पक्ष का शुरू से आरोप रहा कि पत्रकारों द्वारा उठाए जा रहे भ्रष्टाचार के मुद्दों और खबरों के कारण उन पर दबाव बनाने के उद्देश्य से आपराधिक प्रकरण दर्ज किया गया।लेकिन अदालत में जब मामले की सुनवाई हुई तो अभियोजन द्वारा पेश किए गए साक्ष्यों और गवाहों को लेकर बचाव पक्ष ने गंभीर सवाल उठाए।*गवाहों के बयानों ने जांच पर खड़े किए सवाल*बचाव पक्ष के अनुसार, सुनवाई के दौरान कुछ गवाहों ने पुलिस की कार्रवाई के संबंध में ऐसे बयान दिए, जिनसे पूरे प्रकरण की जांच प्रक्रिया सवालों के घेरे में आ गई।दावा किया गया कि कुछ लोग अपने गुम मोबाइल की सूचना देने थाने पहुंचे थे, जहां उनसे कथित तौर पर कोरे कागजों पर हस्ताक्षर करवाए गए और बाद में उन्हीं दस्तावेजों का इस्तेमाल पत्रकारों के खिलाफ प्रकरण में किया गया।यदि ये तथ्य अदालत के आदेश में दर्ज निष्कर्षों के अनुरूप हैं, तो यह जांच प्रक्रिया की गंभीरता पर सवाल खड़े करने वाला पहलू है।*सुनील नामदेव के खिलाफ एक के बाद एक कार्रवाई, लेकिन अदालत में तस्वीर अलग*सुनील नामदेव का मामला इस मायने में भी चर्चा में रहा कि उन्हें अलग-अलग कानूनी मामलों का सामना करना पड़ा। NDPS प्रकरण में अदालत से बरी होने के बाद अब बिलासपुर के मामले में भी उन्हें राहत मिली है।यानी एक तरफ आरोपों की गंभीरता, दूसरी तरफ वर्षों तक चली कानूनी प्रक्रिया और अंत में अदालत से राहत—यह पूरा घटनाक्रम पत्रकारिता, पुलिस कार्रवाई और सत्ता के रिश्ते पर कई सवाल खड़े करता है।*पूर्ववर्ती कांग्रेस शासनकाल पर फिर उठी उंगली*इन फैसलों के बाद पूर्ववर्ती कांग्रेस शासनकाल में पत्रकारों के खिलाफ हुई कार्रवाइयों को लेकर राजनीतिक सवाल फिर तेज हो गए हैं।बचाव पक्ष और पत्रकारों से जुड़े लोगों का आरोप रहा है कि तत्कालीन शासनकाल में सरकार और प्रशासन से जुड़े भ्रष्टाचार के मुद्दे उठाने वाले पत्रकारों पर दबाव बनाने के लिए कानूनी कार्रवाई का सहारा लिया गया।अब जब सुनील नामदेव एक NDPS मामले में पहले ही बरी हो चुके हैं और बिलासपुर मामले में सुनील नामदेव, नीलेश शर्मा तथा साजिद हाशमी भी बरी हो गए हैं, तो उस दौर की कार्रवाई को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।हालांकि किसी कार्रवाई को राजनीतिक रूप से प्रेरित या जानबूझकर किया गया बताने का अंतिम निष्कर्ष संबंधित न्यायिक रिकॉर्ड और प्रमाणित आदेशों के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।*तीन पत्रकारों की लड़ाई बनी बड़ा सवाल*सुनील नामदेव, नीलेश शर्मा और साजिद हाशमी के मामले अब सिर्फ तीन पत्रकारों की व्यक्तिगत कानूनी लड़ाई नहीं रह गए हैं। इनके जरिए यह बड़ा सवाल सामने आया है कि क्या सत्ता और प्रशासन से असहज सवाल पूछने वाले पत्रकारों के खिलाफ आपराधिक मुकदमों का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए किया जाना चाहिए?पत्रकारिता का काम सत्ता की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि उससे सवाल पूछना भी है। सरकार किसी भी दल की हो, भ्रष्टाचार और जनहित के मुद्दों पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है।और जब ऐसे मामलों में वर्षों की कानूनी लड़ाई के बाद अदालत से पत्रकारों को राहत मिलती है, तो स्वाभाविक रूप से उन परिस्थितियों पर भी सवाल उठते हैं जिनमें मुकदमे दर्ज हुए थे।*अब गेंद इतिहास के पन्नों में है*NDPS मामले में सुनील नामदेव पहले ही बरी हो चुके थे। अब बिलासपुर मामले में सुनील नामदेव, नीलेश शर्मा और साजिद हाशमी भी बरी हो गए।ढाई साल की कानूनी लड़ाई के बाद अदालत का फैसला सामने है। आरोप अपनी जगह थे, मुकदमे अपनी जगह—लेकिन अंतिम कसौटी अदालत रही।तीनों पत्रकारों के लिए यह फैसला कानूनी राहत जरूर है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने सत्ता, पुलिस और स्वतंत्र पत्रकारिता के रिश्ते पर जो सवाल खड़े किए हैं, वे इससे कहीं बड़े हैं।

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