शहर की सड़कों पर एक अजीब सा विज्ञान चलता है। इसे “नंबर गेम” कहते हैं। इसमें ट्रैफिक नहीं, आंकड़े चलते हैं। आदमी नहीं, चालान गिने जाते हैं

यातायात विभाग रायपुर…

शहर की सड़कों पर एक अजीब सा विज्ञान चलता है। इसे “नंबर गेम” कहते हैं। इसमें ट्रैफिक नहीं, आंकड़े चलते हैं। आदमी नहीं, चालान गिने जाते हैं।दिन में 43 डिग्री की धूप में जाम में फंसा आम इंसान पिघलता रहता है, लेकिन विभाग की नजरें शायद सनग्लास पहनकर एसी कमरे में आराम फरमा रही होती हैं। उस वक्त सड़क पर पसीना बहाता आदमी दिखाई नहीं देता… क्योंकि वह “टारगेट” में शामिल नहीं होता।जैसे ही रात होती है, अचानक चमत्कार होता है।विभाग की आंखें खुल जाती हैं।सड़कें वही रहती हैं, गड्ढे वही रहते हैं, खतरे वही रहते हैं…बस चालान काटने की मशीन एक्टिव हो जाती है।रात के अंधेरे में हेलमेट, सीट बेल्ट, कागज—सबकी याद आ जाती है।दिन में जो जाम, अव्यवस्था और हादसे होते हैं, वो शायद “डेली रूटीन” मान लिए गए हैं।और सबसे दिलचस्प दृश्य—सफेद वर्दी।इतनी चमकदार कि लगता है जैसे विभाग का सारा समय सड़क पर नहीं, सफेदी पर खर्च हो रहा हो।वर्दी चमक रही है, लेकिन ट्रैफिक व्यवस्था धुंधली है।शहर में रोज हादसे हो रहे हैं, लोग मर रहे हैं…लेकिन चिंता कम, चालान ज्यादा हैं।जैसे जिंदगी से ज्यादा जरूरी “रिकॉर्ड” हो गया हो।आखिर में सवाल यही है—क्या ट्रैफिक व्यवस्था का मकसद लोगों को सुरक्षित रखना है,या फिर बस नंबर बढ़ाना?क्योंकि सड़क पर खड़ा आम आदमी अब समझ चुका है—यह व्यवस्था ट्रैफिक नहीं संभालती…यह सिर्फ “गिनती” संभालती है।

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