आचार्य श्री पद्मलोचन जी महाराज श्री रामेश्वरम धाम मे श्रीमद्भागवत कथा में ध्रुव चरित्र का विस्तार से कथा का वर्णन करते है, जिसमें ध्रुव महाराज के भक्ति, तपस्या और भगवान विष्णु से दर्शन प्राप्त करने की गाथा शामिल है। यह कथा बताती है कि कैसे ध्रुव ने अपने पिता के सौतेले भाई के व्यवहार के कारण वन में जाकर घोर तपस्या की और भगवान से अनन्य भक्ति से दर्शन पाए, जिससे उन्हें देवत्व की प्राप्ति हुई।
कथा का सार ध्रुव के पिता का व्यवहार:राजा उत्तानपाद की पहली पत्नी सुनीति के पुत्र ध्रुव को दूसरी पत्नी सुरुचि के कारण महल से निकाल दिया जाता है।वन की ओर प्रस्थान:सौतेली माँ के अपमान और पिता के उदासीन रवैये से आहत होकर ध्रुव वन की ओर चले जाते हैं, जहां उन्हें नारद मुनि मिलते हैं।नारद जी का मार्गदर्शन:नारद जी ध्रुव को भगवान विष्णु का एक शक्तिशाली मंत्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” प्रदान करते हैं और उन्हें तपस्या के लिए प्रेरित करते हैं।घोर तपस्या:ध्रुव वन में जाकर इस मंत्र का जाप करते हुए घोर तपस्या में लीन हो जाते हैं।भगवान का दर्शन:उनकी भक्ति और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु उनके समक्ष प्रकट होते हैं और उन्हें दर्शन देते हैं।वरदान की प्राप्ति:भगवान विष्णु ध्रुव को अमोघ वरदान देते हैं, जिससे ध्रुव को देवत्व प्राप्त होता है और वे ध्रुव तारे के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं।इस प्रकार, यह कथा भगवान की भक्ति के महत्व को रेखांकित करती है और बताती है कि सच्चे भक्त को कैसे ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है। पुज्य महाराज जी अपनी श्रीमद्भागवत कथाओं में इस चरित्र को सुनाकर भक्तों को भक्ति और वैराग्य का संदेश देती हैं।

