विद्युत नियामक आयोग को सत्यनारायण शर्मा ने लिखा पत्र विद्युत मुख्यालय नया रायपुर में शिफ्ट करनें में होंग 500 करोड़ फिजूल खर्च

विद्युत नियामक आयोग को सत्यनारायण शर्मा ने लिखा पत्र विद्युत मुख्यालय नया रायपुर में शिफ्ट करनें में होंग 500 करोड़ फिजूल खर्च


सत्यनारायण शर्मा ने अपने पत्र मे लिखा विद्युत अधिनियम 2003 की प्रस्तावना में स्पष्ट लिखा गया है कि यह अधिनियम अन्य बातों के साथ-साथ उपभोक्ताओं के हित संरक्षण एवं पारदर्शी नीतियों के संवर्धन के लिये लगाया गया है परंतु यह देखा जा रहा है कि पिछले कई वर्षो से उपभोक्ताओं का हित संरक्षण नहीं हो रहा है, अनावश्यक खर्चो के कारण विद्युत की दरों के अनावश्यक वृद्वि हो रही है। जिन योजनाओं से प्रदेश की जनता लाभान्वित हो सकती है, उन पर ज्यादा ध्यान दिया जना चाहिये।हमारे संज्ञान में यह तथ्य आया है कि विद्युत कंपनियों का मुख्यालय डंगनिया परिसर से हटाकर नया रायपुर ले जाया जा रहा है, इसमें उत्पादन कंपनी सक्रिय रूप से नेतृत्व कर रही है। उन्होंने अपनी तरफ से पूंजीगत व्यय योजना में आयोग के समक्ष प्रस्ताव रखा है कि उस पर होने वाले खर्च का अनुमोदन आयोग प्रदान करें। उत्पादन कंपनी ने अपनी तरफ से इसमें 217 करोड़ रूपये से अधिक की राशि खर्च होने का अनुमान दर्शित किया है, परंतु विशेषज्ञों का अनुमान है कि भवन निर्माण एवं साज-सज्जा पूर्ण करने की स्थिति में इसमें कम से कम रूपये 500 करोड़ का खर्च होगा। यह 500 करोड़ रूपये आगामी वर्षो में आम उपभोक्ताओं से वसूला जायेगा। मुख्यालय के स्थानांतरण से आम उपभोक्ताओं को कोई फायदा नहीं है ना तो इससे विद्युत की दरें कम होगी और ना ही इससे पाॅवर कंपनी के कार्य दक्षता में कोई बढ़ोत्तरी होगी। अधिकांश अधिकारी/कर्मचारी रायपुर मंे ही निवासरत है और वे 25 किलोमीटर आने-जाने में अपनी उर्जा व्यय करेंगे, इससे उनकी कार्यदक्षता नहीं बढेगी।वर्तमान परिसर में पर्याप्त स्थान उपलब्ध है अतः उसी परिसर में कुछ करोड़ रूपये खर्च करके मुख्यालय को व्यवस्थित किया जा सकता है। अनावश्यक खर्च अंततः उपभोक्ताओं से ही वसूल किया जायेगा, जिससे विद्युत की दरों में वृद्वि होगी। अतः इस तरह के अनावश्यक खर्च पर तत्काल रोक लगाई जाये। स्मार्ट मीटर की योजना का मुख्य उद्देश्य शासकीय एवं शासन के उपक्रमों में प्रीपेड मीटर लगाने का था। हमारी जानकारी में आया है कि 1.5 लाख में से मुश्किल से 10 हजार शासकीय विद्युत कनेक्शनों में प्रीपेड मीटर लगाये गये हैं। शासकीय विद्युत कनेक्शनों के भुगतान न होने से विद्युत कंपनियों की आर्थिक हालत खराब हो रही है और वे दूसरे माध्यम से उपभोक्ताओं से वसूली कर रहें है।8000 रूपये का स्मार्ट मीटर गरीब के घर में लगाकर आयोग किसका भला कराना चाहता है समझ से परे है। प्रदेश में 20 लाख के करीब बीपीएल कनेक्शन है, जिनके बिजली बिलों का भुगतान शासन द्वारा किया जाता है। प्रति उपभोक्ता मीटर किराया 80 रूपये के लगभग है, जिसका भुगतान किसके द्वारा किया जायेगा, इसका पता नहीं है। अंततोगत्वा यह आर्थिक भार भी आम उपभोक्ताओं से वसूला जायेगा।प्रदेश में 40 प्रतिशत उपभोक्ता एैसे है जिनकी बिजली खपत 100 यूनिट से कम है। एैसे उपभोक्ताओं के यहां इतने महंगे मीटर लगाने की क्या आवश्यकता है। मोटे तौर पर स्मार्ट मीटर के लगने से करीब 500 करोड़ रूपये प्रतिवर्ष उपभोक्ताओं से अतिरिक्त रूप से वसूल किये जायेंगे, जो उचित नहीं है।अभी -अभी समाचार पत्रों के माध्यम से ज्ञात हुआ है कि आर.डी.एस.एस. (भारत सरकार की योजना) अपने लक्ष्यों से बहुत पीछे चल रही है, जिसकी वजह से इसका लाभ प्रदेश की आम जनता को नहीं मिल पा रहा है। आयोग को समय-समय पर इस योजना की समीक्षा करनी चाहिये ताकि लाभकारी योजनाओं का फायदा आम एवं गरीब लोगों को मिल सके।विद्युत अधिनियम 2003 में आयोग को बहुत सारी शक्तियां प्राप्त है। जहां कार्य की गड़बड़ी हो रही हो उसकी जांच भी आयोग अपने स्तर पर करा सकता है। एैसा करने से विद्युत कंपनियों में समय से कार्य करने की प्रेरणा मिलेगी।विद्युत दरों के निर्धारण के समय पिछले टेरिफ निर्धारण के समय जिस वर्ग के उपभोक्ताओं से अनुमानित राजस्व प्राप्त नहीं होता है, उसी वर्ग के उपभोक्ताओं के बिजली की दरों में बढ़ोतरी की जानी चाहिये तथा अन्य वर्गो पर उसका भार नहीं डाला जाना चाहिये।बिजली का योगदान प्रदेश के सर्वांगीण विकास में बहुत अधिक है। बिजली दरों के निर्धारण, पूंजीगत व्यय योजना की स्वीकृति में अत्यंत सावधानी बरती जानी चाहिये तथा गरीब जनता का पैसा फिजूल खर्चो में नहीं होना चाहिये।मुझे आशा है कि वर्ष 2025-26 के विद्युत दरों के निर्धारण में विद्युत नियामक आयोग इन बातों को ध्यान में रखेगा।


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