“ठेके पर मुशाइरा” पुस्तक लोकार्पण व परिचर्चा



“ठेके पर मुशाइरा” पुस्तक लोकार्पण व परिचर्चा
नई दिल्ली। आमतौर पर कहा जाता है कि नाटक खेलने और देखे जाने वाली विधा है लेकिन इरशाद खान सिकंदर की शैली इतनी सुंदर है कि इस नाटक को पढ़ते समय भी वही अनुभूति होती है जो इसके मंचन को देखने से होती है। सुप्रसिद्ध रंग आलोचक रवींद्र त्रिपाठी ने उक्त विचार इरशाद खान सिकंदर के नाटक ‘ठेके पर मुशाइरा’ के लोकार्पण समारोह में व्यक्त किए। त्रिपाठी ने कहा कि सिकंदर बहुत अच्छे शायर और नाटककार हैं। उनकी भाषा हिंदी और उर्दू का मेल कराती है। बहुत ही सहज भाषा का प्रयोग इरशाद खान करते हैं। विश्व पुस्तक मेले में आयोजित लोकार्पण समारोह में उन्होंने कहा कि इस नाटक का हर चरित्र अपने में एक विशिष्ट पहचान लिए हुए है। नाटक बताता है कि सांस्कृतिक पतन हर जगह हुआ है। दिलीप गुप्ता ने कहा कि इस नाटक का नाम पढ़कर लगा था कि कोई हल्का फुल्का हास्य नाटक होगा। लेकिन ये नाटक अपने हास्य के साथ व्यंग्य प्रस्तुत करता है। मुशायरा संस्कृति हमारे समाज से बीस-तीन वर्षो से गायब हो गयी है। पॉपुलर कल्चर को अधिक महत्त्व दिया जाने लगा है। शिवम ने अपने वक्तव्य में कहा कि इस नाटक में अभिनय संस्कृति को बहुत ही शानदार रूप में प्रस्तुत किया गया है।इस परिचर्चा का संयोजन कर रही अणुशक्ति सिंह ने कहा कि इस नाटक में भाषाओं और बोलियों का मेला है। अंत में इरशाद खान सिकंदर ने नाटक का अंश पाठ किया। प्रकाशक मीरा जौहरी ने नाटककार इरशाद के लेखन और व्यक्तित्व की कि एक ही भाषा में जैसे बहुत सारी बोलियां छिपी होती हैं वैसे ही इरशाद खान में भी बहुत सारे लेखक छिपे हुए हैं। अंत में राजपाल एन्ड सन्ज़ के सम्पादकीय निदेशक चंद्रशेखर चतुर्वेदी ने आभार व्यक्त किया।
नीरज राजपाल एन्ड सन्ज़ कश्मीरी गेट, दिल्ली

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