*रंगोली, चित्रकला, रैली के माध्यम से समुदाय के लोगों को किया जा रहा है जागरूक माहवारी की बात, सबके साथ” कलेक्टर ने दिया संदेश*

अयान न्यूज भांसी दंतेवाड़ा से

संमवाददाता. असीम पाल। मोबाईल। 8815551955

*रंगोली, चित्रकला, रैली के माध्यम से समुदाय के लोगों को किया जा रहा है जागरूक**“ माहवारी की बात, सबके साथ” कलेक्टर ने दिया संदेश**माहवारी में स्वच्छता से न करें समझौता, भ्रांतियों से बचना भी जरूरी* दंतेवाड़ा, 28 मई 2024। कलेक्टर मयंक चतुर्वेदी के निर्देशन में यूनिसेफ एवं महिला बाल विकास विभाग के सहयोग से जिले में 20 मई से 28 मई तक माहवारी स्वच्छता सप्ताह के रूप में मनाया जा रहा है। हम सभी जानते है कि 28 मई का दिन माहवारी दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिवस समाज में माहवारी के प्रति चुप्पी को तोड़ने के लिए एक प्रयास है. क्योंकि आज भी समाज माहवारी को गंदा और शर्म की बात समझता है, जिस पर कोई बात नही करना चाहता और आज भी समाज पूजा न करना, खाना न बनाना, रसोई में न जाना, अलग कमरे में रहना आदि कई प्रकार की भ्रांतियों को मानता है, माहवारी की बात सबके साथ बहुत जरूरी है। भ्रांतियों के कारण किशोरियों और महिलाओं काफी समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है। इन सब भ्रांतियों और माहवारी पर चुप्पी को तोड़ने के उद्देश्य से कलेक्टर के निर्देशन पर जिला प्रशासन दंतेवाड़ा ने “माहवारी की बात, सबके साथ” जागरूकता कार्यक्रम के तहत दंतेवाड़ा, शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय बारसूर एवं सरस्वती माध्यमिक शाला स्कूल बचेली समर कैंप का आयोजन किया गया। जिसमें शिक्षक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, मितानिनों एवं बच्चों के द्वारा रेड डॉट चैलेन्ज के तहत अपने हाथों को लाल रंग से रंगकर आम समुदाय को संदेश दिया। साथ ही ग्राम पंचायतों में किशोर सशक्तिकरण कार्यक्रम के तहत, युवोदय वालंटियर्स के साथ आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, मितानिन के द्वारा माहवारी जागरूकता हेतु रंगोली, चार्ट पोस्टर, दीवार लेखन, चित्रकला, रैली के माध्यम से जागरूक करने का कार्य किया जा रहा है। कलेक्टर मयंक चतुर्वेदी, जिला पंचायत सीईओ कुमार बिश्वरंजन, यूनिसेफ जिला समन्वयक एवं विभिन्न विभागों के अधिकारी कर्मचारियों के साथ जिले के हजारों लोगों ने रेड डॉट चैलेन्ज के तहत अपने हाथों को लाल रंग से रंगकर आम समुदाय को संदेश दिया कि, माहवारी आना एक सामान्य प्रक्रिया है। गर्भधारण करने के लिये माहवारी बहुत जरूरी है, लेकिन भ्रांतियों के चलते इसे एक सामाजिक अभिशाप की तरह किया जाता है।

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