छत्तीसगढ़ होकर ओडिशा से महाराष्ट्र तक कांकेर, धमतरी जैसे जिलों में लगातार मिल रही बाघ की खाल, इसलिए पड़ताल

छत्तीसगढ़ होकर ओडिशा से महाराष्ट्र तक कांकेर, धमतरी जैसे जिलों में लगातार मिल रही बाघ की खाल, इसलिए पड़ताल

कांकेर कोतवाली थाना पुलिस ने 9 अक्टूबर को 2 आरोपियों से 9.5 फीट लंबी बाघ की खाल पकड़े जाने का खुलासा किया। बाद में एक और आरोपी को गिरफ्तार किया गया। मगर, आज तक पुलिस मुख्य तस्कर तक नहीं पहुंच सकी है, न ही यह बता पा रही है कि शिकार कहां हुआ, किसने किया, किसलिए किया और खाल कहां भेजी जानी थी? वन विभाग के पास भी इन सवालों के कोई जवाब नहीं हैं। इस मामले में पड़ताल की हकीकत का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि पुलिस और वन अफसरों के बयान भी अलग-अलग हैं।

पुलिस कह रही है कि आधे घंटे पहले मिली सूचना पर खाल जब्त हुई, तो वन अधिकारी कह रहे हैं कि 3 महीने से सिहावा-विश्रामपुर (जिला धमतरी) इलाके में तस्करों के मूवमेंट पर नजर रखी जा रही थी। इन जांचों के समानांतर भास्कर ने पड़ताल की। सबसे पहले राज्य के विशेषज्ञों को खाल की तस्वीर भेजकर तस्दीक करवाई गई। इन्होंने कहा कि यह बाघ राज्य के रिकॉर्ड में नहीं है। सवाल उठा कि कहां का है? कहा जा रहा है कि वर्ष 2019-20 में एक वयस्क बाघ बालोद में दिखाई दिया था, जिसे वन विभाग ने फॉलो नहीं किया। कुछ दिनों के बाद फिर नहीं दिखा।

यह वह हो सकता है। उधर, इस दौरान यह भी स्पष्ट हो गया कि बाघ को तीर, गोली या अन्य धारदार हथियार से नहीं मारा गया। क्योंकि खाल में चोट का कोई निशान नहीं है। विशेषज्ञों ने बताया कि खाल देखकर लगता है कि जहर दिया गया होगा। मगर, क्यों? अब इस सवाल का जवाब ढूंढना था। ऑपरेशन टीम में शामिल एक स्टाफ को विश्वास में लिया गया। उन्होंने जो बताया वो चौंकाने वाला था। बोले- सूचना थी कि बाघ की खाल के साथ सिहावा-विश्रामपुर में 3-4 लोगों की मूवमेंट है।

अब उसे बाहर निकलवाना था। खबर आई कि फरार मुख्य आरोपी पैसों के लिए तांत्रिक साधना करवाना चाहता है। उसे तांत्रिक की तलाश थी। उनकी टीम तांत्रिक बनी, मुखबिर के जरिए तस्करों को भरोसा दिलाया और कांकेर आने को कहा गया। वे सफल हुए। मगर, मुख्य आरोपी भाग निकला। हाथ लगे सिर्फ कुरियर। बताया जा रहा है कि फरार आरोपी का नाम, पता वन विभाग को मिला है, इस पर अंदरूनी जांच का दावा किया जा रहा है।

(जांच प्रभावित न हो, इसलिए हम नाम प्रकाशित नहीं कर रहे।) अब इस मामले में राजनीतिक-सांप्रदायिक दबाव है। बिंडबना यह है कि पुलिस इस मामले के बैक लिंक में जुटी है, फॉर्वर्ड लिंक पर नहीं। फॉर्वर्ड लिंक से इसके तंत्र साधना के बाद आगे बेचे जाने की कड़ियां जुट सकती हैं।

अयान न्यूज़ ने वन विभाग के अलग-अलग रेंज के उन अधिकारियों से संपर्क किया, जो किसी न किसी ऑपरेशन के हिस्सा थे। इन्होंने जो कहा, वह यह दर्शाता है कि वन्यजीवों के शिकार रोकने के लिए विभाग गंभीर ही नहीं है। राज्य में तस्करी रोकने एक स्पेशल टीम या टॉस्क फोर्स तक नहीं है।

– मध्यप्रदेश, ओडिशा और आंध्रप्रदेश की तर्ज पर स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) बने, जो कार्रवाई के लिए स्वतंत्र हो। इनका अपना इंटेलीजेंस हो, साइवर सेल हो, ताकि लोकेशन और अन्य सर्च हो सके। लॉजिस्टिक हो। कार्रवाई के लिए जिलों की सीमाएं न हों, ऑपरेशन की परमिशन हो।
– अधिकतर मामलों में रेंजर से नीचे रैंक के अधिकारी कोर्ट में चालान पेश करते हैं। शेड्यूल-1 एनिमल में यह नियम-विरुद्ध है। इसलिए सजा नहीं होती। राज्य में अब तक बाघ की खाल के साथ पकड़े गए किसी भी आरोपी को सजा नहीं हुई।

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