कृषि विरोधी कानूनों के खिलाफ जिले में प्रदर्शन और किसान श्रृंखलाएं बनाई किसान सभा ने

छत्तीसगढ़ किसान सभा (CGKS)

कृषि विरोधी कानूनों के खिलाफ जिले में प्रदर्शन और किसान श्रृंखलाएं बनाई किसान सभा ने

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति, छत्तीसगढ़ किसान आंदोलन और छत्तीसगढ़ किसान सभा के आह्वान पर मोदी सरकार द्वारा बनाये गए किसान विरोधी कानूनों के खिलाफ और न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था सुनिश्चित करने, खाद्यान्न आत्मनिर्भरता और ग्रामीण जनता के लिए न्यूनतम मजदूरी और रोजगार सुनिश्चित करने की मांग पर जिले में कई स्थानों पर किसानों और आदिवासियों ने सड़कों पर उतरकर किसान श्रृंखलाएं बनाई,और इन कॉर्पोरेटपरस्त कानूनों को निरस्त करने की मांग की। आंदोलनकारी संगठनों ने केंद्र सरकार के बनाये कानूनों के दुष्प्रभावों को निष्प्रभावी करने के लिए राज्य के स्तर पर एक सर्वसमावेशी कानून बनाने की भी मांग की है। उल्लेखनीय है कि आज 500 से अधिक किसान संगठनों द्वारा “कॉर्पोरेट भगाओ – खेती-किसानी बचाओ – देश बचाओ” के केंद्रीय नारे पर दिल्ली में संसद पर प्रदर्शन के साथ ही देशव्यापी आंदोलन का आह्वान किया गया था। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और जनवादी महिला समिती के कार्यकर्ता भी इस आंदोलन के समर्थन में आज सड़कों पर उतरे।

आज यहां जारी एक बयान में छत्तीसगढ़ किसान सभा के जवाहर सिंह कंवर,प्रताप दास,नंदलाल कंवर, दीपक साहू और माकपा जिला सचिव प्रशांत झा ने सफल आंदोलन के लिए किसान समुदाय और आम जनता का आभार व्यक्त किया है और कहा है कि देश और छत्तीसगढ़ की जनता ने इन कानूनों के खिलाफ जो तीखा प्रतिवाद दर्ज किया है, उससे स्पष्ट है कि आम जनता की नजरों में इन कानूनों की कोई वैधता नहीं है और इन्हें निरस्त किया जाना चाहिए।

किसान श्रृंखला और प्रदर्शन को माकपा पार्षद राजकुमारी कंवर, सूरती कुलदीप, माकपा जिला सचिव प्रशांत झा,जनवादी महिला समिति की प्रदेश संयोजक धनबाई ने संबोधित किया संगठनों ने आरोप लगाया कि इन कॉर्पोरेटपरस्त और कृषि विरोधी कानूनों का असली मकसद न्यूनतम समर्थन मूल्य और सार्वजनिक वितरण प्रणाली की व्यवस्था से छुटकारा पाना है। कृषि व्यापार के क्षेत्र में मंडी कानून के निष्प्रभावी होने और निजी मंडियों के खुलने से देश के किसान समर्थन मूल्य से वंचित हो गए हैं। चूंकि ये कानून किसानों की फसल को मंडियों से बाहर समर्थन मूल्य से कम कीमत पर खरीदने की कृषि-व्यापार करने वाली कंपनियों, व्यापारियों और उनके दलालों को छूट देते हैं और किसी भी विवाद में किसान के कोर्ट में जाने के अधिकार पर प्रतिबंध लगाते हैं, इसलिए ये किसानों, ग्रामीण गरीबों और आम जनता की बर्बादी का कानून है।

आंदोलनकारी संगठनों का मानना है कि समर्थन मूल्य पर सरकार यदि धान नहीं खरीदेगी, तो कालांतर में गरीबों को एक और दो रुपये की दर से राशन में चावल-गेहूं भी नहीं मिलेगा और सार्वजनिक वितरण प्रणाली पंगु हो जाएगी। इन कानूनों का असर सहकारिता के क्षेत्र की बर्बादी के रूप में भी नज़र आएगा। इसके साथ ही व्यापारियों को असीमित मात्रा में खाद्यान्न जमा करने की छूट देने से और कंपनियों को एक रुपये का माल अगले साल दो रुपये में और उसके अगले साल चार रुपये में बेचने की कानूनी इजाजत देने से कानून बनने के कुछ दिनों के अंदर ही कालाबाज़ारी और जमाखोरी बढ़ गई है और बाजार की महंगाई में आग लग है।

उन्होंने कहा कि इन कानूनों को बनाने से मोदी सरकार की स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने और किसानों की आय दुगुनी करने की लफ्फाजी की भी कलई खुल गई है। किसान नेताओं ने कहा कि कॉर्पोरेट गुलामी की ओर धकेलने वाले इन कृषि विरोधी कानूनों के खिलाफ देश के किसान तब तक संघर्ष करेंगे, जब तक इन्हें बदला नहीं जाता। किसान आंदोलन के नेताओं ने दिल्ली पहुंचने के लिए निकले किसानों पर हरियाणा, उत्तरप्रदेश और दिल्ली की सीमाओं पर अमानवीय बर्बरता किये जाने की भी तीखी निंदा की है। उन्होंने कहा कि कॉरपोरेटों की तिजोरी भरने के लिए देश के किसानों से टकराव लेने वाली कोई सरकार टिक नहीं सकती।

जवाहर सिंह कंवर
छत्तीसगढ़ किसान सभा

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