केंद्र की भाजपा सरकार किसानों के हित में कानून की बात कहकर पूंजीपतियों के लिए कानून लाया जा रहा है- राजेन्द्र बंजारे पूर्व जनपद अध्यक्ष. छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव एवम पूर्व जनपद अध्यक्ष राजेंद्र पप्पू बंजारे ने केंद्र की भाजपा सरकार के द्वारा लाये गए नई कृषि नीति की आलोचना करते हुए कहा कि भाजपा की मोदी सरकार किसानों के हित मे कानून की बात कहकर पूंजीपतियों के लिए कानून लाया जा रहा है ऐसा काला कानून लाना भाजपा की किसान विरोधी चेहरा उजागर हुआ है, जिसकी जितनी भी निंदा किया जाय कम है। पूर्व जनपद अध्यक्ष राजेंद्र बंजारे ने कहा कि नये कानून में अनाज भंडारण की सीमा हटा ली गई है और जमाखोरी को कानून बना दिया गया है. सरकार इस बात पर नजर रखना बंद कर देगी कि कौन व्यापारी कितना अनाज जमा करके रखे हुए है. जमाखोरी कौन करेगा? रिटेल में उतर रहीं कॉरपोरेट कंपनियां, जिनकी नजर अब खुदरा बाजार पर है.
कांग्रेस प्रदेश सचिव राजेन्द्र बंजारे ने आगे कहा कि सरकार कह रही है कि किसान अपनी फसल कहीं भी बेच सकेगा. भारत में 86% किसान ऐसे हैं जिनके पास 2 हेक्टेयर या इससे कम खेती है. क्या ये किसी दूसरी जगह या दूसरे राज्य में जाकर अपनी फसल बेच सकते हैं? तो फिर ये कानून किसके लिए है?
सरकार के नये कानून से देश की मंडियां खत्म हो जाएंगी. मंडियां खत्म होने से न्यूनतम समर्थन मूल्य खत्म हो जाएगा. जमाखोरी को लीगल कर देने से महंगाई बढ़ेगी.
सरकार एक तरफ कह रही है कि मंडी में अलग कानून होगा और मंडी से बाहर मार्केट का अलग कानून होगा. उधर सरकार ये भी कह रही है कि हम ‘एक देश एक बाजार’ बना रहे हैं. जब कानून दो होगा तो ‘एक देश एक बाजार’ कैसे हुआ?
जब राज्य की कृषि की प्रकृति अलग है, पैदावार अलग है, फसलें अलग हैं तो एक देश एक बाजार का क्या मतलब हुआ? कांग्रेस प्रदेश सचिव राजेन्द्र बंजारे ने आगे कहा कि भाजपा के द्वारा लाये गये काले कृषि कानून को सीधी भाषा मे समझिये :-
सरकारी मंडी व्यवस्था बंद हो जायेगी,
किसान का अनाज बिकेगा भी कि नही कोई गारंटी नही,
अनाज बिकने मे लेट हो सकता है,
पैसे मिलने मे लेट हो सकता, पूंजीपति कम रेट मे माल खरीदेगा।
भाजपा के द्वारा पूरा निजीकरण का प्लान है
पीएम मोदी चिल्ला चिल्ला कर न्यूनतम समर्थन मूल्य कीमत की बात कर रहे हैँ, जबकि पूरे बिल मे न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसे शब्द का एक भी बार उल्लेख नहीं हैँ। मोदी इतना ही न्यूनतम समर्थन मूल्य के बारे मे चिंतित हैँ तो उसका उल्लेख बिल में क्यों नहीं करते??
काले क़ानून के समर्थन में वैसे ही नकली कृषि विशेषज्ञ खड़े कर दिए जैसे नोटबंदी के समय नकली अर्थशास्त्री समर्थन में खड़े कर दिए थे।

