
(सीएए) के खिलाफ देश के तमाम हिस्सों में होने वाले प्रदर्शनों के शुरू होने के बहुत पहले एक शख्स दिल्ली के तमाम इलाकों में इस प्रस्तावित कानून के जागरूकता फैलाने के लिए पर्चे बांट रहा था। इसी तरह दिल्ली के में और एनआरसी के खिलाफ आयोजित महिलाओं के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के पीछे भी इसी शख्स की अहम भूमिका बताई जाती है। इसका नाम है शरजील इमाम।
शाहीन बाग में आने वाले कुछ पत्रकारों और प्रदर्शनकारियों के अलावा जेएनयू के इस 31 साल के पीएचडी स्कॉलर को अब तक बहुत ज्यादा लोग नहीं जानते थे। लेकिन सोमवार को देश के पांच राज्यों की पुलिस उसे खोज रही थी, तमाम अखबारों में उसके फोटो छपे थे, उसके मुद्दे पर दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बीच तीखी नोंकझोंक भी हुई।
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एएमयू में दिया था विवादित भाषण आईआईटी बॉम्बे से कंप्यूटर साइंस में ग्रैजुएट पर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) में दिए गए असम और पूर्वोत्तर को ‘देश से काट देने’ वाले भाषण को लेकर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया गया। इमाम को पुलिस ने मंगलवार को जहनाबाद (बिहार) से पकड़ा जहां वह पला-बढ़ा। इसके बाद उसे पूछताछ के लिए दिल्ली ले जा रहा है। हालांकि, इमाम ने ट्विटर पर साफ किया उसने सरेंडर किया था लेकिन दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया कि उसे अरेस्ट किया गया। शरजील की मां अफशान रहीम ने एक खत लिखकर पुलिस और अधिकारियों के कथित दुर्व्यवहार का जिक्र किया है। उनका कहना है कि इमाम को ‘ऐसे बयान के लिए दोषी ठहराया जा रहा है जिसे मीडिया ने संदर्भ से हटकर, तोड़मरोड़कर पेश किया है।’
इमाम की सफाई- केवल चक्का जाम का आह्वान किया
16 जनवरी को एएमयू में दिए अपने भाषण में इमाम ने ‘असम में मुसलमानों की बुरी स्थिति’ की ओर ध्यान खींचने की कोशिश की थी जिन्हें डिटेंशन सेंटर भेजा जा रहा था। उसने यह भी कहा था कि ‘असम की मदद’ करने के लिए उन्हें सेना और वहां जाने वाली रसद का ‘रास्ता रोकना होगा’। हालांकि, बाद में इमाम ने अखबारों में यह स्पष्टीकरण दिया कि उसने प्रदर्शनकारियों की शिकायतों की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए ‘चक्का जाम’ करने का आह्वान किया था। फेसबुक पर भी उसकी तमाम पोस्ट में चक्का जाम की बात देखी जा सकती है। उसने इस बात पर भी जोर दिया कि विरोध शांतिपूर्ण होना चाहिए।
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मुस्लिम मुद्दों पर आवाज उठाता रहा है
पटना के सेंट जेवियर हाई स्कूल और दिल्ली के वसंत विहार के दिल्ली पब्लिक स्कूल में अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने वाला इमाम शुरू से ही मुसलमानों के खिलाफ होने वाले भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाता रहा है। साल 2016 में जेएनयू के स्टूडेंट नजीब अहमद के गायब होने के बाद उसने मुसलमानों को लेकर प्रचलित ‘पूर्वाग्रहों’ और कॉर्पोरेट जगत से अपने मोहभंग होने के विषय में काफी लिखा था। नजीम इमाम के ही हॉस्टल में रहता था।
कभी लेफ्ट के साथ था, अब आलोचक है
जेएनयू में इमाम के सीनियर्स ने हमारे सहयोगी टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि वह पढ़ने में अच्छा है। शुरू में वह वाम विचारधारा के साथ था लेकिन बाद में राजनीतिक मतभेदों के चलते उसने उनसे दूरी बना ली। उसके एक दोस्त ने बताया, ‘इमाम अपने विचारों को लेकर बहुत मुखर है और लेफ्ट राजनीति का आलोचक है। वह फीस में बढ़ोतरी के खिलाफ प्रदर्शन समेत जेएनयू में होने वाले कई विरोध प्रदर्शनों में भी हिस्सा ले चुका है। वह दो साल के लिए ऑल इंडिया स्टूडेंट्स असोसिएशन (आइसा) का दो साल तक सदस्य रहा, उसने काउंसलर के पद के लिए चुनाव भी लड़ा लेकिन नजीब के गायब होने के बाद उसने आइसा भी छोड़ दी।
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बाबरी पर फैसले के बाद किया था प्रदर्शन
पिछले साल अक्टूबर में जब केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करने के मुद्दे पर बोलने के लिए जेएनयू गए थे उस समय इमाम प्रदर्शनकारियों के बीच था। बाबरी मस्जिद मामले में कोर्ट के फैसले के बाद उसने जेएनयू परिसर में एक विरोध प्रदर्शन भी किया था।
Source: National

