हार पर हार, राज्यों में अब BJP बदलेगी रणनीति?

अखिलेश सिंह, नई दिल्ली
ऐसा नहीं है कि बीजेपी नेतृत्व को झारखंड की सियासी हवा का अंदाज नहीं था। आलाकमान को पता था कि इस बार का चुनाव बहुत कठिन होने जा रहा है और कोई चमत्कार ही हार को टाल पाएगा। हालांकि, सूबे में पहली बार नंबर वन पार्टी का ताज भी छिन जाएगा, इससे शायद नेतृत्व को हैरानी हुई होगी। बीजेपी नेतृत्व का यह आकलन सीएम रघुबर दास के बारे में मिले फीडबैक पर आधारित था। विकास के मोर्चे पर अच्छे कामों पर दास का अहंकारी, अड़ियल और चिड़चिड़ा रवैया भारी पड़ गया और उनका यही रवैया सूबे में पार्टी को एक साथ लेकर चलने के संबंध में उनकी अक्षमता का सबब बन गया।

मुख्यमंत्रियों के सशक्तीकरण की नीति पर फिर से विचार मुमकिन
एक और राज्य में शिकस्त से बीजेपी अबतक अपने मुख्यमंत्रियों को लेकर अपनी रणनीति पर पुनर्विचार के लिए मजबूर हो सकती है। हाल के वर्षों में बीजेपी की यही रणनीति रही है कि संबंधित राज्यों में मुख्यमंत्रियों को एक तरह से फ्री हैंड दे दिया जाता है। सरकार चलाने से लेकर चुनाव में टिकट देने, न देने से लेकर संभावित गठबंधन पर फैसले तक में संबंधित मुख्यमंत्रियों की ही चलती है। हालांकि, हार के बाद बीजेपी मुख्यमंत्रियों को ज्यादा ताकत देने की अपनी नीति पर फिर से मंथन कर सकती है।

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इस नीति से बीजेपी को फायदा तो मिल रहा लेकिन नुकसान भी
कांग्रेस से बीजेपी इस मामले में अलग रही है कि वह राज्य-स्तर के नेताओं को पर्याप्त जगह और तवज्जो देती है। इस नीति की वजह से पार्टी को सेकंड लाइन लीडरशीप को उभारने में मदद मिलती है। लेकिन मुख्यमंत्रियों के सशक्तीकरण की नीति के कुछ नुकसान भी हुए हैं। इससे नेताओं में अहंकार से लेकर बिना किसी चुनौती के कोई भी फैसला लेने की ताकत जैसे भाव भी घर कर जाते हैं। झारखंड की करारी शिकस्त से केंद्रीय नेतृत्व को अब मुख्यमंत्रियों को मजबूत बनाने की नीति पर एक बार फिर से नजर डालने के लिए मजबूर कर सकती है।

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यह कैल्कुलेशन भी फेल कि रघुबर दास पिछड़ों को साध पाएंगे
कार्यकर्ताओं के बीच रघुबर दास की अलोकप्रियता जगजाहिर थी, इसके बावजूद नेतृत्व उनके साथ खड़ा रहा। इसकी एक वजह विकल्पों की कमी थी तो दूसरी वजह यह आकलन था कि वह पार्टी के लिए पिछड़े वर्ग का समर्थन जुटा पाएंगे। यह कैल्कुलेशन भी रघुबर दास के अहं और ‘खुद की सर्वोच्चता’ के भाव की भेंट चढ़ गया। दास अपने स्टाइल में काम करते रहे तो इस दौरान पार्टी का एक बड़ा तबका धीरे-धीरे उनसे दूर होता रहा।

स्टेट लीडर्स निरंकुश न होने पाएं, अंदरखाने उठने लगी मांग
लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपीशासित यूपी, असम और उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव होंगे। अब पार्टी के अंदरखाने यह मांग भी उठने लगी है कि नेतृत्व को स्टेट लीडर के एकतरफा रवैये पर अंकुश लगाना चाहिए। स्टेट लीडर्स को निरंकुश न होने दिया जाए। झारखंड की हार के बाद पार्टी के भीतर यह आवाज और मुखर हो सकती है।

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ब्रैंड मोदी और राष्ट्रीय मुद्दों पर हद से ज्यादा निर्भरता का नुकसान
झारखंड के नतीजों से एक बात साफ तौर पर उभरी है कि ब्रैंड मोदी और राष्ट्रीय मुद्दे राज्यों में सत्ताविरोधी रुझान को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। पीएम मोदी और बीजेपी चीफ अमित शाह ने चुनाव प्रचार में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। हालांकि, पार्टी सूत्रों का कहना है कि गृह मंत्रालय में चुनौतीपूर्ण कामों को अंजाम देने में शाह की व्यस्तता से पार्टी की चुनावी रणनीति कहीं न कहीं प्रभावित हो रही है।

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गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी की वजह से शाह नहीं दे पा रहे पर्याप्त समय?
अमित शाह कैंपेन में शामिल थे लेकिन अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि इसमें पहले की तरह रणनीतियों को बनाने और अंजाम देने की कमी दिखी। 2014 के लोकसभा चुनाव में यूपी के चुनाव प्रभारी रहते शाह ने सूबे में डेरा डालकर सफल चुनाव अभियान चलाया था। उसके बाद झारखंड चुनाव में यह सिलसिला टूट गया। पहली बार अमित शाह किसी अहम चुनावी राज्य में रातभर नहीं रुके। डेरा नहीं डाला। सूत्रों ने बताया कि शाह पार्टी में अपनी भूमिका को सीमित करने की कोशिश में हैं ताकि जेपी नड्डा के लिए मंच तैयार हो सके जो जल्द ही पार्टी की कमान संभालने वाले हैं।

Source: National

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