
पत्र में ऐक्ट को जरूरी बताते हुए कहा गया कि 1950 के नेहरू-लियाकत पैक्ट की असफलता के चलते यह लाया गया है। यहां तक कि विचारधारा से ऊपर उठकर सीपीएम, कांग्रेस जैस पार्टियों ने भी पाकिस्तान और बांग्लादेश से आने वाले शरणार्थियों को भारत की नागरिकता देने की मांग की थी। इनमें से ज्यादातर दलित समुदाय के लोग हैं।
यही नहीं अकादमिक जगत के विद्वानों ने इस ऐक्ट के लिए केंद्र सरकार और संसद को बधाई भी दी है। पत्र में भारत के सिद्धांतों को बनाए रखने और धर्म के आधार पर पीड़ित समुदायों को शरण देने के लिए सरकार की सराहना की है।
‘नॉर्थ ईस्ट की चिंताओं का भी किया जाए सावधान’पत्र में नॉर्थ ईस्ट के राज्यों की चिंताओं को भी ध्यान में रखने की बात करते हुए कहा गया, ‘हम यह भी मानते हैं कि पूर्वोत्तर के राज्यों की चिंताओं को भी सुना जाना चाहिए और उनका समाधान होना चाहिए। यह ऐक्ट भारत की सेक्युलरिज्म की परंपरा और संविधान के मुताबिक है। यह किसी भी धर्म और किसी भी देश के व्यक्ति को भारत की नागरिकता लेने से नहीं रोकता।’
‘अहमदिया, हजारा, बचोल भी हासिल कर सकते हैं नागरिकता’
अकादमिक जगत के लोगों और स्कॉलर्स ने कहा कि यह ऐक्ट पड़ोसी देशों में प्रताड़ित होने वाले अहमदिया, हजारा, बलोच या फिर अन्य किसी समुदाय के लोगों को भारतीय नागरिकता हासिल करने से नहीं रोकता।
ऐक्ट के समर्थन में इन लोगों ने जारी किया बयान
ऐक्ट के समर्थन में बयान जारी करने वाले विद्वानों की सूची में जेएनयू के प्रफेसर ऐनुल हसन, नालंदा यूनिवर्सिटी की वाइस चांसलर प्रफेसर सुनैना सिंह, जेएनयू के रजिस्ट्रार डॉ. प्रमोद कुमार, डीयू के स्वदेश सिंह, स्तंभकार स्वप्न दासगुप्ता, रिसर्च फेलो सुशांत सरीन, लेखक अनिर्बान गांगुली समेत कुल 1100 लोग शामिल हैं।
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Source: National

