तुलसी बाराडेरा में मनाया धूमधाम से गोवर्धन पूजा-बंजारे गोवर्धन पूजा तुलसी बाराडेरा में धूमधाम से मनाया गया। गोवर्धन पूजा में अपने गृह ग्राम में धरसींवा जनपद पंचायत के पूर्व अध्यक्ष एवं वर्तमान जनपद सदस्य राजेन्द्र पप्पू बंजारे ने गाव के गोठान पहुचकर गाय के गोबर से बने गोवेर्धन पर्वत की पूजा किये इसके बाद यादव बंधुओ ने बछड़े को गाय के गोबर से बने गोवर्धन पर्वत पर घुमाकर चलाया गया,ततपस्चात गाव के किसान गाय के गोबर को एक दूसरे के माथे में टिका लगाकर, गले लगकर गोवर्धन पूजा की बधाई दिए। पूर्व जनपद अध्यक्ष राजेन्द्र पप्पू बंजारे ने गोवेर्धन पूजा की कहानी को बताते हुए कहा कि कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष को गोवर्धन पूजा मनाई जाती है। गोवर्धन को ‘अन्नकूट पूजा’ भी कहा जाता है। दिवाली के अगले दिन पड़ने वाले त्योहार पर लोग घर के आंगन में गोबर से गोवर्धन पर्वत का चित्र बनाकर गोवर्धन भगवान की पूजा करते हैं और परिक्रमा लगाते हैं। इस दिन भगवान को अन्नकूट का भोग लगाकर सभी को प्रसाद दिया जाता है
श्री बंजारे ने बताया कि श्री कृष्ण ने देखा कि सभी बृजवासी इंद्र की पूजा कर रहे थे। जब उन्होंने अपनी मां को भी इंद्र की पूजा करते हुए देखा तो सवाल किया कि लोग इन्द्र की पूजा क्यों करते हैं? उन्हें बताया गया कि वह वर्षा करते हैं जिससे अन्न की पैदावार होती और हमारी गायों को चारा मिलता है। तब श्री कृष्ण ने कहा ऐसा है तो सबको गोर्वधन पर्वत की पूजा करनी चाहिए क्योंकि हमारी गायें तो वहीं चरती हैं।
उनकी बात मान कर सभी ब्रजवासी इंद्र की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करने लगे। देवराज इन्द्र ने इसे अपना अपमान समझा और प्रलय के समान मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी। तब भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठा कर ब्रजवासियों की भारी बारिश से रक्षा की थी। इसके बाद इंद्र को पता लगा कि श्री कृष्ण वास्तव में विष्णु के अवतार हैं और अपनी भूल का एहसास हुआ। बाद में इंद्र देवता को भी भगवान कृष्ण से क्षमा याचना करनी पड़ी। इन्द्रदेव की याचना पर भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को नीचे रखा और सभी ब्रजवासियों से कहा कि अब वे हर साल गोवर्धन की पूजा कर अन्नकूट पर्व मनाए। तब से ही यह पर्व गोवर्धन के रूप में मनाया जाता है।
गोवर्धन पूजा तुलसी बाराडेरा में धूमधाम से मनाया गया। गोवर्धन पूजा में अपने गृह ग्राम में धरसींवा जनपद पंचायत के पूर्व अध्यक्ष एवं वर्तमान जनपद सदस्य राजेन्द्र पप्पू बंजारे ने गाव के गोठान पहुचकर गाय के गोबर से बने गोवेर्धन पर्वत की पूजा किये इसके बाद यादव बंधुओ ने बछड़े को गाय के गोबर से बने गोवर्धन पर्वत पर घुमाकर चलाया गया,ततपस्चात गाव के किसान गाय के गोबर को एक दूसरे के माथे में टिका लगाकर, गले लगकर गोवर्धन पूजा की बधाई दिए। पूर्व जनपद अध्यक्ष राजेन्द्र पप्पू बंजारे ने गोवेर्धन पूजा की कहानी को बताते हुए कहा कि कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष को गोवर्धन पूजा मनाई जाती है। गोवर्धन को ‘अन्नकूट पूजा’ भी कहा जाता है। दिवाली के अगले दिन पड़ने वाले त्योहार पर लोग घर के आंगन में गोबर से गोवर्धन पर्वत का चित्र बनाकर गोवर्धन भगवान की पूजा करते हैं और परिक्रमा लगाते हैं। इस दिन भगवान को अन्नकूट का भोग लगाकर सभी को प्रसाद दिया जाता है
श्री बंजारे ने बताया कि श्री कृष्ण ने देखा कि सभी बृजवासी इंद्र की पूजा कर रहे थे। जब उन्होंने अपनी मां को भी इंद्र की पूजा करते हुए देखा तो सवाल किया कि लोग इन्द्र की पूजा क्यों करते हैं? उन्हें बताया गया कि वह वर्षा करते हैं जिससे अन्न की पैदावार होती और हमारी गायों को चारा मिलता है। तब श्री कृष्ण ने कहा ऐसा है तो सबको गोर्वधन पर्वत की पूजा करनी चाहिए क्योंकि हमारी गायें तो वहीं चरती हैं।
उनकी बात मान कर सभी ब्रजवासी इंद्र की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करने लगे। देवराज इन्द्र ने इसे अपना अपमान समझा और प्रलय के समान मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी। तब भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठा कर ब्रजवासियों की भारी बारिश से रक्षा की थी। इसके बाद इंद्र को पता लगा कि श्री कृष्ण वास्तव में विष्णु के अवतार हैं और अपनी भूल का एहसास हुआ। बाद में इंद्र देवता को भी भगवान कृष्ण से क्षमा याचना करनी पड़ी। इन्द्रदेव की याचना पर भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को नीचे रखा और सभी ब्रजवासियों से कहा कि अब वे हर साल गोवर्धन की पूजा कर अन्नकूट पर्व मनाए। तब से ही यह पर्व गोवर्धन के रूप में मनाया जाता है।


