अयोध्या: चित्रकार कैनवस पर उकेर रहे हैं प्रभु राम की गाथा

वीएन दास,
अयोध्या शोध संस्थान, संस्कृति विभाग की ओर से चल रहा नौ दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कला शिविर दूसरे दिन की शाम तक पूरी तरह राममय हो गया है। पर्यटन विभाग के विशाल सभागार में देश- विदेश के चित्रकारों के कैनवस राम के विभिन्न रूपों से रंग गए हैं। सात दिनों में तैयार चित्रकृतियों और नाटक का प्रदर्शन अयोध्या में 26 अक्टूबर को एक विशाल समारोह में सम्पन्न होगा।

सभी कलाकारों के लिए विषय है- ‘श्री राम’ लेकिन सभी के लिए संदर्भ अलग-अलग हैं। दीप्तिश घोष दस्तीदार इस शिविर में भाग लेने कोलकाता से आए हैं। उन्होंने अपनी कृति में संदर्भ लिया है अहिल्या का। उनके कैनवस पर राम को पृथ्वी पर पड़े ‘पत्थर हो चुके’ पत्थर की ओर से राम को दिखाया गया है। सिर्फ और सिर्फ शुद्ध अक्रेलिक रंगों से बड़े कैनवस पर राम और अहिल्या का संदर्भ रूपकृत कर रहे दीप्तिश अहिल्या को स्त्री रूप में दर्शाएंगे या नहीं यह अभी अप्रकट रहस्य का कौतूहल है।

अवधेश मिश्र ने राम में शिव को देखा है। यहां शिव को अपना नेत्र दे रहे राम नहीं है। इस कैनवस पर शिव लिंगरूप में और राम शब्दरूप में प्रकट है। संदर्भ का मर्म रविवार की शाम तक स्पष्ट होता चला जाएगा। विजयवाड़ा से आए गिरिधर गौड़ एक साथ दो पेंटिंग रच रहे हैं। एक में राम हैं तो दूसरे में श्रद्धावनत हनुमान। वह कहते हैं, प्रतिभा के साथ हममें बुराई के रूप में छह रिपु काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर भी सक्रिय रहते हैं। भय, घृणा, हिंसा और झूठ यदि और जोड़ लें तो ये दस सिर हम हमेशा साथ लिए चलते हैं।

पहली पेंटिंग में अपने इसी रावण की मृत्यु को दूसरी पेंटिंग में वर्णित उपाय से दर्शाया गया है। इसमें हनुमान श्रद्धावनत हैं। गिरिधर कहते हैं अगर हम में ऐसा समर्पण भाव आ जाए तो बुराई अपने आप सूखे पत्ते की तरह मन और देह वृक्ष से अलग हो जाती है। रावण के दस सिर ओडिशा से आए मानस रंजन जेना ने भी दर्शाए हैं अपनी तैयार हो रही चित्रकृति में लेकिन वह आधुनिक समय की दस बड़ी बुराइयों के नाम उन दस सिरों पर लिखेंगे, ऐसी रूपरेखा अभी उनके जेहन में है।

भारतीय चित्रकारों के ब्रश जहां अक्रेलिक रंगों से सने हैं वही थाई चित्रकारों को पूरा आत्मविश्वास है अपने थांगका कपड़े और प्राकृतिक ढंग से तैयार रंगों पर। उनके राम उन्हीं की शैली में उभर रहे हैं। थाई देश से आए खोन नृत्यशैली के चार शिक्षक भारतेंदु नाट्य अकादमी के प्रेक्षागार में दो दर्जन चुने हुए रंग विद्यार्थियों को अपनी पारंपरिक नृत्यशैली में पारंगत कर रहे हैं। इस शैली में कुछ युद्धकौशल, कुछ मणिपुरी नृत्यशैली और मुखौटा पहनने के एक विशेष ढंग के कारण इसे खोन शैली कहते है। इस शैली में वे युवा कलाकारों को रामलीला नाट्यरूप के लिए निपुण कर रहे हैं। मुख्य संदर्भ राम रावण युद्ध का ही रहेगा।

Source: Uttarpradesh

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